मंगलकारी होते है सप्ताह के दिन

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मंगलकारी होते है सप्ताह का हर। मानसिक, शारीरिक और आत्मिक शांति प्राप्त करने के लिए व्रत-उपवास का सहारा ले सकते हैं। यह रोग और व्याधियों को दूर करने में भी सहायक होता, व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार सप्ताह में एक उपवास रखना चाहिए।
रविवार- अच्छा स्वास्थ्य व तेजस्विता पाने के लिए उपवास रखना चाहिए। रविवार सूर्य का दिन होता है और सूर्य सभी ग्रहों के मुखिया है।
सोमवार-  उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति को सोमवार का उपवास रखना चाहिए। यह दिन चंद्रमा का होता है। इसी दिन सूर्य-पृथ्वी और चंद्रमा की अवस्था इस तरह की होती है कि हमारे शरीर पर उसका शांतिदायक प्रभाव पड़ता है।
मंगलवार- मंगल से पीड़‍ित व्यक्ति को उपवास एवं हनुमान जी की आराधना अवश्य करनी चाहिए। हर कार्य में मंगलकारी परिणाम प्राप्त करने के लिए मंगलवार का उपवास रखना चाहिए।
बुधवार- कमजोर मस्तिष्क वाले एवं आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को बुधवार के दिन उपवास रखना चाहिए। यह भगवान गणेश का दिन माना गया है और श्रीगणेश बुद्धि के दाता है।
गुरुवार- बृहस्पति, देवताओं के गुरु हैं। छिछली मानसिकता वाले व्यक्ति को यह उपवास अवश्य रखना चाहिए। बृहस्पति सत्व गुणी हैं तथा ज्ञान, अच्छे एवं सकारात्मक विचार और शिक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं।
शुक्रवार- शीघ्रपतन, प्रमेह रोग के रोगियों को उपवास रखना चाहिए क्योंकि शुक्रवार ओज, तेजस्विता, शौर्य, सौंदर्यवर्धक और शुक्रवर्धक होता है। शुक्र देव 'शुक्र वार' के स्वामी हैं। वे धन, खुशी, सौंदर्य और प्रजनन का प्रतिनिधित्व करते हैं
शनिवार- समस्त दुखों एवं परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए उपवास रखना चाहिए। भगवान शनि आपकी परेशानियों को दूर करने में सहायता करते हैं।

शिव का अवतार हैं हनुमान

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शिव का अवतार हैं हनुमान
शास्त्रों में रामभक्त हनुमान के जन्म की दो तिथि का उल्लेख मिलता है। जिसमें पहला तो उन्हें भगवान शिव का अवतार माना गया है, क्योंकि रामभक्त हनुमान की माता अंजनी ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी और उन्हें पुत्र के रूप में प्राप्त करने का वर मांगा था।
तब भगवान शिव ने पवन देव के रूप में अपनी रौद्र शक्ति का अंश यज्ञ कुंड में अर्पित किया था और वही शक्ति अंजनी के गर्भ में प्रविष्ट हुई थी। फिर चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को हनुमान का जन्म हुआ था।
पंडितों के अनुसार हनुमान जयंती का विशेष महत्व है। मंगल ग्रह से विशेष रूप से प्रभावित जातकों को भगवान हनुमान की उपासना करना चाहिए।
जिनकी जन्मपत्रिका में मंगल ग्रह निर्बल हैं, उन जातकों के लिए मंगल ग्रह से संबंधित दान-पुण्य व मंत्र जाप करना हितकारी रहेगा।

हनुमान भक्तों को इस दिन हनुमान चालीसा का पाठ, मंगल ग्रह के मंत्र का जाप और गरीबों को गुड़, चना और लड्डू दान करना चाहिए।
हनुमान का जन्मोत्सव
पवनपुत्र हनुमान का जन्मोत्सव हस्त नक्षत्र होने से यह योग निर्मित हो रहा है। मारुतिनंदन को चोला चढ़ाने से जहां सकारात्मक ऊर्जा मिलती है वहीं बाधाओं से मुक्ति भी मिलती है। हनुमानजी को भक्ति और शक्ति का बेजोड़ संगम बताया गया है।  चैत्र माह की पूर्णिमा पर भगवान राम की सेवा के उद्देश्य से भगवान शंकर के ग्यारहवें रुद्र ने अंजना के घर हनुमान के रूप में जन्म लिया था।
पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए शनि को शांत करना चाहिए। जब हनुमानजी ने शनिदेव का घमंड तोड़ा था तब सूर्यपुत्र शनिदेव ने हनुमानजी को वचन दिया है कि उनकी भक्ति करने वालों की राशि पर आकर भी वे कभी उन्हें पीड़ा नहीं देंगे।
ऐसे में अमृतयोग में उनकी जयंती पर पूजन करना ज्यादा फलदायक होगा। बजरंगबली की उपासना करने वाला भक्त कभी पराजित नहीं होता। हनुमानजी का जन्म सूर्योदय के समय बताया गया है इसलिए इसी काल में उनकी पूजा-अर्चना और आरती का विधान है।
दास हनुमान राम के आगे हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं और उनकी पूंछ जमीन पर रहती है जबकि वीर हनुमान योद्धा मुद्रा में होते हैं और उनकी पूंछ उठी रहती है। दाहिना हाथ सिर की ओर मुड़ा हुआ रहता है। कहीं-कहीं उनके पैरों तले राक्षस की मूर्ति भी होती है
शरीर को लाभ : हनुमानजी की उपासना व चोला चढ़ाने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। जिन लोगों को शनिदेव की पीड़ा हो उन्हें बजरंग बली को तेल-सिंदूर का चोला अवश्य चढ़ाना चाहिए।
हनुमानजी अपने भक्तों की सच्चे मन से की गई हर तरह की मनोकामना पूरी करते हैं और अनिष्ट करने वाली शक्तियों को परे रखते हैं।

प्रायः शनिवार व मंगलवार हनुमानजी के दिन माने जाते हैं। आध्यात्मिक उन्नति के लिए वाममुखी अर्थात जिसका मुख बाईं तरफ ओर हो हनुमान या दास हनुमान की मूर्ति को पूजा में रखने का रिवाज है। दास हनुमान और वीर हनुमान बजरंग बली के दो रूप बताए गए हैं।


शिव की आराधना करें श्रावण मास में

भोलेनाथ की पूजा-अर्चना
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पूरे माह भर भोलेनाथ की पूजा-अर्चना का दौर जारी रहेगा। शिव मंदिरों में श्रावण मास के अंतर्गत विशेष तैयारियां की गई हैं। श्रद्धालुओं द्वारा 'बम-बम भोले और ॐ नम: शिवाय' की गूंज सुनाई देगी। शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आएंगी।
श्रावण का यह महीना भक्तों को अमोघ फल देने वाला है। माना जाता है कि भगवान शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की पूरी नगरी का भार है। उसमें श्रावण मास अपना विशेष महत्व रखता है।
इस दौरान खास तौर पर महिलाएं श्रावण मास में विशेष पूजा-अर्चना और व्रत-उपवास रखकर पति की लंबी आयु की प्रार्थना भोलेनाथ से करती हैं। खास कर सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत श्रेष्ठ माना जाता है।
इस व्रत को वैशाख, श्रावण मास, कार्तिक मास और माघ मास में किसी भी सोमवार से प्रारंभ किया जा सकता है। इस व्रत की समाप्ति पर सत्रहवें सोमवार को सोलह दंपति को भोजन व किसी वस्तु का दान उपहार देकर उद्यापन किया जाता है।
पुराणों के अनुसार श्रावण मास में शिवजी को एक बिल्वपत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। एक अखंड बिल्वपत्र अर्पण करने से कोटि बिल्वपत्र चढ़ाने का फल प्राप्त होता है। शिव को कच्चा दूध, सफेद फल, भस्म, भांग, धतूरा, श्वेत वस्त्र अधिक प्रिय होने के कारण यह सभी चीजों खास तौर पर अर्पित की जाती है।

श्रावण मास शिव का पाठ एवं मंत्र जाप करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है।

सोमवार व्रत कथा

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श्रावण सोमवार की कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे। इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतर्मन से बहुत दुखी था क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।  दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा। पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था। उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- 'हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है।

कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।' भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- 'हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।'  इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- 'नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।'

पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं। लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।'  उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।  भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया। 

व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम अमर रखा।  जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।  लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।

वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।  वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।  अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- 'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'

जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।  जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।  मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- 'प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।'  भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- 'पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'  पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।' पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।

शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।  राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।  रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।  व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे।

व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।' व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।  सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं। शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।

सात पुत्रों की हत्या

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कुछ महा बाद महारानी गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया। पुत्र-जन्म की सूचना पाकर महाराज शांतनु खुशी से झूम उठे और खबर लाने वाली दासी को पुरस्कार स्वरूप अपने गले की कीमती माला देकर गंगा के महल की ओर दौड़ पड़े। मगर यह देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि महारानी नवजात शिशु को गोद में उठाए गंगा नदी की ओर जा रही हैं। उन्होंने कुछ पूछना चाहा, किन्तु तभी उन्हें गंगा की शर्त याद आ गई और खामोश होकर वे महारानी गंगा के पीछे चल दिए।

तट पर जाकर गंगा ठिठककर मुड़ी, फिर उनकी ओर देखकर धीमे से मुस्कराई। उसके बाद उसने अपने पुत्र को नदी में बहा दिया। यह देखकर महाराज शांतनु को धक्का-सा पहुंचा। रानी गंगा मुस्कराती हुई वापस लौट पड़ी। महाराज शांतनु आंखें फाड़े उसे देखते रहे, मगर वचन में बंधे होने के कारण बोले कुछ नहीं।
कुछ दिन महाराज को पुन: रानी गंगा के गर्भवती होने की सूचना मिली तो वे पुत्र के सदमे को भूल गए और मन कामना लगे कि इस बार गंगा अपने पहले भचयानक कृत्य को नहीं दोहराएगी और शीघ्र ही उनका पुत्र उनकी गोद में खेलेगा।
मगर उनकी यह कामना पूर्ण न हो सकी। पुत्र के जन्म की सूचना पाकर वे फिर गंगा के महल की ओर दौड़े तो फिर से गंगा को नदी के तट की ओर जाते देखकर सन्न रह गए। वे पागलों की तरह उसके पीछे लपके, मगर चाहकर भी उसे रोक न सके। गंगा ने इस बार भी तट पर जाकर पुत्र को नदी की गोद में डाल दिया।
महाराज शांतनु का कलेजा चाक-चाक हो गया। उनकी आँखों में क्रोध और पीड़ा के आंसू साथ-साथ दिखाई देने लगे, लेकिन वचन में बंधे होने के कारण वे कह ही क्या सकते थे।
और इसी प्रकार रानी ने महाराज शांतनु के एक-एक कर सात पुत्रों की हत्या कर दी।
राजा देखते और खून के आंसू रोते। उनकी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिलते। वे स्वयं को धिक्कारते, ‘कैसा राजा है तू ? एक स्त्री तेरी आंखों के सामने तेरे पुत्रों की हत्या करती है और तू मूकदर्शक बना देखता रहता है। क्या यह न्याय है ? धिक्कार है तुझ पर।’ 
अब महाराज शांतनु का सब्र जवाब दे गया। उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अपने आठवें पुत्र की हत्या वे इस प्रकार नहीं होने देंगे।
कुछ समय पश्चात रानी गंगा ने उनके आठवें पुत्र को जन्म दिया और पहले की भांति उसे लेकर गंगा तट की ओर चल दी। इस बार महाराज शांतनु घात लगाए बैठे थे। वे रानी के पीछे-पीछे तट की ओर चल दिए। फिर रानी गंगा ने ज्यों ही पुत्र को जल में बहाने के लिए हाथ आगे बढ़ाए, त्यों ही महाराज शांतनु गरजकर बोले, ‘‘बस, बस बहुत हुआ। हाथ रोक लो गंगा। क्या तुम जानती हो कि यह तुम मेरे आठवें पुत्र की हत्या करने की चेष्टा कर रही हो ? आखिर तुम चाहती क्या हो ? क्या तुम यह चाहती हो कि मेरा वंश समाप्त हो जाए और इस राज्य को कोई उत्तराधिकारी न मिले ?’’
महाराज शांतनु की गर्जना सुनकर रानी गंगा ने हाथ पीछे खींच लिए और पलटकर बोली, ‘‘आपने मुझे टोककर अपना वचन भंग कर दिया है राजन, इसलिए अब मैं आपके पास नहीं रह सकती, किन्तु जाने से पहले मैं आपको अपने कृत्य का रहस्य अवश्य बताऊंगी। राजन ! मैं स्वर्ग की गंगा हूं। एक बार आठ वसुओं से अप्रसन्न होकर महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें शाप दे दिया कि तुम पृथ्वी पर जाकर सांसारिक कष्ट भोगो।

शांतनु का विवाह गंगा से

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महाभारत  की कथा का प्रारंभ हस्तिनापुर के महाप्रतापी राजा शांतनु से होता है। महाराज शांतनु के पूर्वजों में महाराज भरत और उनके पिता महाराज दुष्यन्त का विशेष उल्लेख है। महाराज दुष्यन्त चक्रवर्ती राजा थे उनके बल एवं पौरुष की मिसाल नहीं दी जा सकती। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं मेनका द्वारा उत्पन्न एवं दुष्यन्त एवं शकुंतला से उत्पन्न हुए थे भरत, जो बचपन में शेरों के साथ खेला करते थे एवं उनके मुंह में हाथ डालकर उनके दांत गिना करते थे। वे बड़े ही निडर, बलशाली एवं बुद्धिमान थे। उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।
महाराज शांतनु  की कथा
एक बार महाराज शांतनु शिकार खेलने के लिए वन में गए। उसी वन से होकर गंगा नदी बहती थी। नदी के तट का दृश्य बड़ा ही मनोहर एवं मुग्ध कर देने वाला था। तब महाराज शांतनु ने नदी किनारे रथ रुकवाया और उतरकर वहीं टहलने लगे। अचानक उनकी दृष्टि एक सुंदर युवती पर पड़ी, जो नदी से निकलकर जल के ऊपर इस प्रकार चलने लगी मानो पृथ्वी पर चल रही हो। उसकी अद्वितीय सुंदरता एवं जल पर चलने का चमत्कार देखकर महाराज शांतनु उस पर मुग्ध हो गए और अपनी सुध-बुध खो बैठे।
वह सुंदरी चलती हुई महाराज शांतनु के निकट आई तो अधीर होकर उन्होंने पूछा, ‘‘तुम कौन हो सुंदरी और इस वन प्रदेश में अकेली क्यों घूम रही हो ?’’
‘‘आप क्यों पूछ रहे हैं ?’’ खनखनाते स्वर में स्त्री ने पूछा।
उसकी मधुर आवाज सुनकर तो राजा शांतनु और अधिक बेचैन हो उठे और बोले, ‘‘हे मधुरभाषिणी ! तुम्हें देखकर मैं अपने होश खो बैठा हूं। मैं हस्तिनापुर का शासक शांतनु हूं तथा तुमसे विवाह का इच्छुक हूं।’’
‘‘मैं आपका प्रस्ताव स्वीकार कर सकती हूं राजन, मेरी दो शर्तें हैं ?’’
‘‘कैसी शर्ते देवि ? जल्दी बताओ, हमें हर शर्त स्वीकार है।’’
‘‘पहली शर्त तो यह है कि आप मुझसे यह नहीं पूछेंगे कि मैं कौन हूं अथवा कहां से आई हूं। दूसरी शर्त यह है कि मैं जो कुछ भी करुंगी, आप उसे सिर्फ देखेंगे, किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे। जिस दिन भी आप ने मेरी शर्तों का उल्लंघन किया, मैं उसी दिन आपको छोड़कर चली जाऊंगी।’’
ये शर्ते सुनते ही महाराज शांतनु स्तब्ध रह गए। ये शर्तें सामान्य स्थिति में उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार न होतीं, किंतु इस समय उस सुंदरी के सौंदर्य ने उन पर जादू किया हुआ था, अत: दिल के हाथों मजबूर होकर उन्होंने ये शर्तें स्वीकार कर लीं और वचन दे दिया कि मैं तुम्हारी शर्तों के अनुसार कभी तुमसे कुछ नहीं पूछूंगा और न कुछ कहूंगा।
यह वचन पाकर सुंदरी उनसे विवाह के लिए राजी हो गई और वहीं दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया।

महाराज शांतनु को गंगा के किनारे मिली थी, इसलिए उन्होंने उसे ‘गंगा’ नाम दिया और अपने महल में ले आए। इसी बीच महाराज शांतनु राज-काज की बातें भूलकर गंगा के प्यार में खोए रहे और राज-काज मंत्रियों ने संभाला। अब उन्हें गंगा के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही न था।