दुनिया के सात महापाप क्या हैं?

अकसर आप लोगों ने दुनिया के सात आश्चर्य यानी seven wonders के बारे में सुना पढ़ा, और देखा होगा. इन अजूबों में अब भारत का ताजमहल भी शामिल है, लेकिन क्या आप सात महापाप के बारे में भी जानते हैं?

हम लेकर आए हैं दुनिया के सात महापाप. क्या होते हैं ये सात महापाप? अंग्रेज़ी भाषा और पश्चिमी साहित्य एवं संस्कृति में इसे किस प्रकार देखा जाता है?

अंग्रेज़ी में इन्हें सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) भी कहा जाता है.

जब से मनुष्य ने होश संभाला है तभी से उनमें पाप-पुण्य, भलाई-बुराई, नैतिक-अनैतिक जैसे आध्यात्मिक विचार मौजूद हैं. सारे धर्म और हर क्षेत्र में इसका प्रचलन किसी न किसी रूप में ज़रूर है.

यह सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) इस प्रकार हैं:

लस्ट (Lust)
ग्लूटनी (Gluttony)
ग्रीड (Greed)
स्लौथ (Sloth)
रैथ (Wrath)
एनवी (Envy)
प्राइड (Pride)

ये सारे शब्द भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun) के रूप हैं. लेकिन इनमें से कई का प्रयोग क्रिया और विशेषण के रूप में भी होता है. अगर इन्हें ग़ौर से देखें तो पता चलता है कि इन सारे महापाप की हर जगह भरमार है.

पुराने ज़माने में इन सब को बड़े पाप में शामिल किया जाता था और उनसे बचने की शिक्षा दी जाती थी. पुराने ज़माने में ईसाई धर्म में इन सबको घोर पाप की सूची में रखा गया था क्योंकि इनकी वजह से मनुष्य सदा के लिए दोषी ठहरा दिया जाता था और फिर बिना कंफ़ेशन के मुक्ति का कोई चारा नहीं था.

 सेक्स शॉप
कामवासना या कामुकता को सात महापापों में से एक माना जाता है.
लस्ट (Lust) यानी लालसा, कामुकता, कामवासना (Intense or unrestrained sexual craving)- ये मनुष्य को दंडनीय अपराध की ओर ले जाते हैं और इनसे समाज में कई प्रकार की बुराईयां फैलती हैं. विशेषण में इसे लस्टफुल (lustful) कहते हैं

ग्लूटनी (Gluttony) यानी पेटूपन. इसे भी सात महापापों में रखा गया है. जी हां दुनिया भर में तेज़ी से फैलने वाले मोटापे को देखें तो यह सही लगता है कि पेटूपन बुरी चीज़ हैं और हर ज़माने में पेटूपन की निंदा हुई है और इसका मज़ाक़ उड़ाया गया है. ठूंस कर खाने को महापाप में इस लिए रखा गया है कि एक तो इसमें अधिक खाने की लालसा है और दूसरे यह ज़रूरतमंदों के खाने में हस्तक्षेप का कारण है.

मध्यकाल में लोगों ने इसे विस्तार से देखा और इसके लक्षण में छह बातें बताईं जिनसे पेटूपन साबित होता है. वह इस प्रकार हैं.

eating too soon--------------eating too eagerly

eating too expensively----- eating too daintily

eating too much-------------eating too fervently

ग्रीड (Greed) यानी लालच, लोभ. यह भी लस्ट और ग्लूटनी की तरह है और इसमें अत्यधिक प्रलोभन होता है. चर्च ने इसे सात महापाप की सूची में अलग से इस लिए रखा है कि इसमें धन-दौलत का लालच शामिल है (An excessive desire to acquire or possess more than what one needs or deserves, especially with respect to material wealth)

स्लौथ (Sloth) यानी आलस्य, सुस्ती और काहिली (Aversion to work or exertion; laziness; indolence). पहले स्लौथ का अर्थ होता था उदास रहना, ख़ुशी न मनाना.

इसे महापाप में इसलिए रखा गया था कि इसका मतलब था ख़ुदा की दी हुई चीज़ से परहेज़ करना. इस अर्थ का पर्याय आज melancholy, apathy, depression, और joylessness होगा. बाद में इसे इसलिए पाप में शामिल रखा गया क्योंकि इसकी वजह से आदमी अपनी योग्यता और क्षमता का प्रयोग नहीं करता है.

रैथ (Wrath) ग़ुस्सा, क्रोध, आक्रोश. इसे नफ़रत और ग़ुस्से का मिला जुला रूप कहा जा सकता है जिसमें आकर कोई कुछ भी कर जाता है. ये सात महापाप में अकेला ऐसा पाप है जिसमें आपका अपना स्वार्थ शामिल न हो (Forceful, often vindictive anger)

एनवी (Envy) यानी ईर्ष्या, डाह, जलन, हसद. यह ग्रीड यानी लालच से इस अर्थ में अलग है कि ग्रीड में धन-दौलत ही शामिल है जबकि यह उसका व्यापक रूप है. यह महापाप इसलिए है कि कोई गुण किसी में देख कर उसे अपने में चाहना और दूसरे की अच्छी चीज़ को सहन न कर पाना.

प्राइड (Pride) यानी घमंड, अहंकार, अभिमान को सातों माहापाप में सबसे बुरा पाप समझा जाता है. किसी भी धर्म में इसकी कठोर निंदा और भर्त्सना की गई है. इसे सारे पाप की जड़ समझा जाता है क्योंकि सारे पाप इसी के पेट से निकलते हैं. इसमें ख़ुद को सबसे महान समझना और ख़ुद से अत्यधिक प्रेम शामिल है.

अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार क्रिस्टोफ़र मारलो ने अपने नाटक डॉ. फ़ॉस्टस में इन सारे पापों का व्यक्तियों के रूप में चित्रण किया है. उनके नाटक में यह सारे महापाप इस क्रम pride, greed, envy, wrath, gluttony, sloth, lust में आते हैं.

अब जबकि आपने सात अजूबों के साथ सात महापाप भी देख लिए हैं तो ज़रा सात महापुण्य भी देख लें. यह इस प्रकार हैं.

लस्ट (Lust)--------- Chastity पाकीज़गी, विशुद्धता,

ग्लूटनी (Gluttony)-- Temperance आत्म संयम, परहेज़,

ग्रीड (Greed)-------- Charity यानी दान, उदारता,

स्लौथ (Sloth)--------Diligence यानी परिश्रमी,

रैथ (Wrath)--------- Forgiveness यानी क्षमा, माफ़ी

एनवी (Envy)---------Kindness यानी रहम, दया,

प्राइड (Pride)-------- Humility विनम्रता, दीनता, विनय

तो फिर क्या सोच रहे हैं. चलिए इन महापापों से बचने और सदगुणों को अपनाना की प्रक्रिया शुरु कर दीजीए.
7.बकवास (बिना कारण बोलते रहना)।
8.चोरी करना।
9.तन, मन, कर्म से किसी को दु:ख देना।
10.पर-स्त्री या पुरुष से संबंध बनाना
पाप का घड़ा भरा, जल्द होगा 'कल्कि अवतार
बोध गया के महाबोधि मंदिर में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने मंदिर परिसर में व्याप्त आध्यात्मिक शांति और आस्था की नींव को हिलाने का प्रयास किया। यह किन लोगों की हरकत थी, यह तो सुरक्षा एजेंसियां बताएगी।

लेकिन जो भी आस्था की नींव हिलाने का नापाक मंसूबा लेकर आए थे उनके मुंह पर धर्म और आस्था ने जोरदार तमाचा मारा है क्योंकि धमाके के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था कम नहीं हुई और परंपरागत तौर पर नियमित पूजा जारी रही। 

लेकिन इस धमाके ने अधर्म को उसके नाश की ओर एक कदम और आगे बढ़ा दिया है। क्योंकि जैसे जैसे पाप बढ़ रहा है वैसे वैसे भगवान के कल्कि अवतार लेने की घड़ी नजदीक आती जा रही है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

अर्थात 'जब जब संसार में धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म प्रबल होने लगाता है तब तब धर्म की स्थापना के लिए और संतजनों की रक्षा के लिए मैं अवतार लेता हूं।' महाबोधि मंदिर में हुए धमाके से फिर धर्म की हानि हुई। इससे पहले भी दहशतगर्द कई बार आस्था की नींव हिलाने की नापाक कोशिश कर चुके हैं। अपने पाप पूर्ण इरादों को अंजाम देने के लिए इन्होंने धर्म नगरी बनारस में कई बार विस्फोट किए।

कलयुग में यहां अवतार लेंगे भगवान

इनके निशाने पर मंदिर ही नहीं मस्जिद भी होती हैं। हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजमेर की दरगाह, दिल्ली की जामा मस्जिद, मालेगांव की नूरानी मस्जिद में हुए धमाके इसके गवाह हैं कि दहशतगर्दो का मकसद किसी व्यक्ति या संप्रदाय को नुकसान नहीं पहुंचाना नहीं है, ये समूचे धर्म का नाश करना चाहते हैं।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब अधर्म ने धर्म को नुकसान पहुचाने का प्रयास किया है तब-तब भगवान ने अवतार लिया है। भगवान वराह, नृसिंह, राम और कृष्ण का अवतार इसके प्रमाण हैं।

वर्तमान स्थिति भी इस ओर संकेत कर रही है कि भगवान जल्दी ही अवतार लेकर अधर्म का नाश करेंगे और धर्म को पुर्नस्थापित करेंगे। लेकिन इस बार भगवान का शत्रु असुर नहीं है बल्कि असुर प्रवृति वाला मनुष्य है जो छिपकर धर्म की जड़ काटने में लगा है। इसलिए भगवान को कृष्ण से भी अधिक चतुर और चालाक बनकर अवतार लेना होगा

















दस पुण्य और दस पाप
हिंदू धर्मग्रंथ वेदों का संक्षिप्त है उपनिषद और उपनिषद का संक्षिप्त है गीता। स्मृतियां उक्त तीनों की व्यवस्था और ज्ञान संबंधी बातों को क्रमश: और स्पष्ट तौर से समझाती है। पुराण, रामायण और महाभारत हिंदुओं का प्रचीन इतिहास है धर्मग्रंथ नहीं।

विद्वान कहते हैं कि जीवन को ढालना चाहिए धर्मग्रंथ अनुसार। यहां प्रस्तुत है धर्म अनुसार प्रमुख दस पुण्य और दस पाप। इन्हें जानकर और इन पर अमल करके कोई भी व्यक्त अपने जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।


धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥-मनु स्मृति 6/92

दस पुण्य कर्म-
1.धृति- हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना।
2.क्षमा- बदला न लेना, क्रोध का कारण होने पर भी क्रोध न करना।
3.दम- उदंड न होना।
4.अस्तेय- दूसरे की वस्तु हथियाने का विचार न करना।
5.शौच- आहार की शुद्धता। शरीर की शुद्धता।
6.इंद्रियनिग्रह- इंद्रियों को विषयों (कामनाओं) में लिप्त न होने देना।
7.धी- किसी बात को भलीभांति समझना।
8.विद्या- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ज्ञान।
9.सत्य- झूठ और अहितकारी वचन न बोलना।
10.अक्रोध- क्षमा के बाद भी कोई अपमान करें तो भी क्रोध न करना।

दस पाप कर्म-
1.दूसरों का धन हड़पने की इच्छा।
2.निषिद्ध कर्म (मन जिन्हें करने से मना करें) करने का प्रयास।
3.देह को ही सब कुछ मानना।
4.कठोर वचन बोलना।
5.झूठ बोलना।
6.निंदा करना।