कर्म का रहस्य

कर्म तीन प्रकार के बताये गए हैं : - [ १ ] संचित - अनेक पूर्व जन्मों से लेकर अब तक किये गए संग्रहित कर्मों को संचित कर्म कहते हैं | [ २ ] प्रारब्ध - अपार संचित कर्मों से , पुन्य - पाप के ढेर में से कुछ अंश लेकर जो शरीर बनता है , उसमें इस जन्म में भोगने वाले कर्म - फल , जो परिपक्व होने पर फल के रूप में मनुष्य को प्राप्त होते हैं , उनको प्रारब्ध कहते हैं | इस प्रकार जब तक संचित कर्म शेष हैं , उनसे प्रारब्ध [ कर्म - फल ] बनता ही रहता है | अर्थात जब तक सारे संचित कर्म नष्ट नहीं हो जाते , मनुष्य की मुक्ति नहीं हो सकती | क्योंकि संचित से स्फुरणा , स्फुरणा से क्रियमाण [ नए किये जाने वाले कर्म ] और क्रियमाण से पुन: संचित तथा संचित के अंश से प्रारब्ध | इस प्रकार जीव कर्म - प्रवाह में बहता ही रहता है | [ ३ ] क्रियमाण - मन वचन और शरीर से मनुष्य जो कुछ नए कर्म करता है , वह जब तक क्रिया रूप में रहता है , तब तक वह क्रियमाण कहलाता है और पूरा होते ही तत्काल संचित बन जाता है | जैसे नई कमाई करना क्रियमाण है और बैंक में जमा होते ही संचित हो जाता है | नए कर्म करने में , भगवान ने मनुष्य को स्वतंत्रता दी है | वह देवी संपदा का आश्रय भी ले सकता है और आसुरी का भी |