शिव जगत पिता हैं
तथा इस संसार की संरचना में उनकी इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए उनकी शक्ति ही प्रकृति का रूप धारण करती है। यह शक्ति ईश्वर की प्रतिछाया बनकर महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में इस सृष्टि के संचालन में प्रभु का सहयोग करती है। प्रकृति ईश्वर की माया शक्ति, जीवन शक्ति एवं नैसर्गिक गुण है। जिस प्रकार सूर्य एवं उसकी रोशनी, आग एवं उसकी प्रज्जवलन क्षमता को अलग नहीं किया जा सकता ​है उसी प्रकार प्रकृति को भी उस चैतन्य प्रभु की छवि के रूप में देखा जा सकता है।

प्रकृति शब्द का यदि संधि विच्छेद किया जाए तो प्र+कृति बनता है। प्र का अर्थ है सर्वोच्च, असाधारण एवं सर्वोत्कृष्ट एवं कृति का अर्थ है रचना। इस प्रकार प्रकृति ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है। इसे और अधिक गहराई से देखें तो प्र का अर्थ है सत्व, कृ का अर्थ है राजस एवं ति का अर्थ है तमस। अर्थात ईश्वर की वह सर्वोच्च कृति जो कि तीनों गुणों की अधिष्ठात्री एवं संचालिका है। मनुष्य को इस संसार के कालचक्र से यही शक्ति मुक्ति दिला सकती है इस शक्ति को वेदों मे महाविद्या की संज्ञा दी गई है।मनुष्य के मष्तिष्क, शरीर एवं अन्तर्मन पर इसी शक्ति का आधिपत्य है। अपने नित्य स्वरूप में यह भक्तों को कर्म फल से मुक्ति दिलाती है। संसार चक्र में घोर कष्ट पा रही जीवात्मा इसी देवी की आराधना करके सांसरिक बंधनों से मुक्ति पाकर उस परमपिता परमेश्वर की ओर अग्रसर हो सकती है।


यह शक्ति मनुष्य के अन्तर्मन मे स्थापित होकर उसकी बुद्धि, मेधा, घृती, स्मृति, लक्ष्मी, शोभा, श्रद्धा, क्षमा आदि सभी गुणों को नियंत्रित करती है।

यही देवी मनुष्य की 72 हजार नाड़ियों की स्वामिनी है। यही आध्याशक्ति विश्व के ज्ञान की प्रवर्तक एवं संचालिका है। परम पिता परमेश्वर से लेकर विश्व के कण-कण फर इसी शक्ति का आधिपत्य है। आधुनिक विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकारता है क्योंकि विज्ञान के अनुसार भी शक्ति के अभाव में वस्तु का कोई महत्व नहीं है। शक्ति विन्यास ही स्वयं वस्तु का स्वरूप निर्धारित करता है।

तंत्र-शास्त्र
तंत्र-शास्त्र में इसी शक्ति की आराधना की जाती है। तंत्र-शास्त्र से तात्पर्य उन गूढ़ साधनाओं से है जिनके द्वारा इस संसार को संचालित करने वाली विभिन्न दैवीय शक्तियों का आव्हान किया जाता है। तंत्र-शास्त्र में विभिन्न पूजा विधियों का इस प्रकार से प्रयोग किया जाता है जिससे वह साधक के मन, मष्तिष्क एवं व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन ला सकें। जिससे उसमें सद्गुणों का विकास हो एवं वह जीवन के परम पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की क्रमिक प्राप्ति कर सके।

तंत्र साधना के समय उच्चारित मंत्र, विभिन्न मुद्रायें एवं क्रियाएं अत्यंत व्यस्थित, नियमित एवं नियंत्रित तरीके से होती हैं। इसमें जरा सी भी चूक होने से परिणाम अत्यंत नकारात्मक हो सकते हैं अत: इस प्रक्रिया के समय साधक को अत्यंत सजग एवं सचेत रहने की आवश्यकता होती है।

किसी भी साधक के लिए तंत्र साधना को यंत्रवत करना असंभव है। इस प्रकार तंत्र साधना के द्वारा साधक में जागरूकता, सजगता, चेतना एवं नियमबद्दता आदि गुणों का विकास किया जाता है।

आधुनिक युग में कुछ लोगों ने तंत्र साधना का दुरुपयोग करके तंत्र साधना की विश्वसनीयता के बारे में सवाल खड़े कर दिए हैं। परंतु शास्त्रों में वर्णित तंत्र साधनाएँ इस प्रकार की साधनाओं से पूर्णतः भिन्न हैं। तंत्र में श्मशान, उजाड़ स्थान आदि को इसलिए चुना जाता है जिससे कि साधक का जीवन के अंतिम सत्य से साक्षात्कार हो सके तथा उसे ईश्वर की सार्वभौमिकता एवं जीवन की निरर्थकता का आभास हो।

इस प्रकार सच्चा तांत्रिक एक सात्विक व्यक्ति होता है एक योगी होता है जो कि ईश्वर के दैवी रूप की साधना करता है। तथा इस तंत्र साधना का उद्देश्य साधक मे सद्गुणों का विकास करना, उसे सांसारिक मोह माया से दूर करना एवं अध्यात्म की ओर अग्रसर करना है।

तंत्र मे ईष्ट का अर्थ ज्योतिष मे प्रयुक्त ईष्ट से भिन्न है। ज्योतिष मे ईष्ट का अर्थ सुकर्मों में वृद्धि एवं आशीर्वाद प्राप्त करना है। जबकि तंत्र में ईष्ट का अर्थ बुराई एवं कष्ट का अंत है। तंत्र शास्त्र की मान्यता है कि बुराई एवं कष्ट अविद्या का परिमाण है। तथा इस अविद्या, बुराई एवं कष्टों से मुक्ति शक्ति की आराधना से ही मिल सकती है।

शक्ति का शाब्दिक अर्थ है दैवीय शक्ति, उन्नति एवं बल। इस शक्ति को भगवती भी कहा जा सकता है जिसका अर्थ भी उन्नति, धन, बल एवं यश प्रदान करना है।