ज्ञान का अहंकार अज्ञानी बना देता है- 
 विश्व में जितने भी प्रचलित कथित  धर्म हैं उनके प्रचारक सक्रिय हैं।  हर धर्म का प्रतीक और पवित्र कोई रंग माना गया है जिससे रंगे वस्त्र यह प्रचारक पहनते हैं।  इनके पहनने से ही आम लोग उनको सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।  यह अलग बात है कि ऐसे अनेक कथित धार्मिक ठेकेदार अपनी अधार्मिक गतिविधियों के कारण बदनाम भी हुए हैं। हम यहां उन धार्मिक वाचकों की बात कर रहे हैं जो भले ही अधार्मिक गतिविधियों मे लिप्त न हों पर समाज पर शासन करने की उनकी प्रवृत्ति ही उनको इस धर्म के पेशे से जोड़ लेती हैं।  मुख्य बात यह है कि वह अपने धर्म के बारे में लोगों को प्रवचन यही सोचकर देते हैं कि वह ज्ञानी है। यह सोच अहंकार का प्रमाण है।  यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में तत्व ज्ञान का उपदेश केवल अपने ही भक्तों में करने का प्रतिबंध लगा दिया जबकि पाश्चात्य विचारधाराओं में धर्म का प्रचार एक महत्वपूर्ण काम माना गया।  सवाल यह है कि कोई वाकई धर्म का मर्मज्ञ है इसका प्रमाणपत्र कौन देगा? आमजन तो दे ही नहीं सकते जो ऐसे लोगों के सामने केवल इसलिये नतमस्तक होते हैं क्योंकि धन, पद और बल के केंद्रबिंदु में ऐसे अनेक कथित धर्माचार्य आते हैं जिन्होंने चालाकी से अपनी छवि बनायी होती है। यह कथित ज्ञानी एक दूसरे को व्यवसायिकता प्रतिस्पर्धा के कारण ऐसा प्रमाणपत्र दे नहीं सकते।  सभी में अपने ज्ञान का अहंकार नाक पर मक्खी की तरह बैठा रहता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः
यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः

            हिंदी में भावार्थ -जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि

            हिंदी में भावार्थ - बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।

            मनुष्य की पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि तथा अहंकार स्वाभाविक रूप से रहते हैं। अच्छे से अच्छे ज्ञानी को कभी न कभी यह अहंकार आ जाता है कि उसके पास सारे संसार का अनुभव है। इस पर आजकल अंग्रेजी शिक्षा पद्धति लोग तो यह मानकर चलते हैं कि उनके पास हर क्षेत्र का अनुभव है जबकि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बिना उनकी स्थिति अच्छी नहीं है। सच तो यह है कि आजकल जिन्हें गंवार समझा जाता है वह अधिक ज्ञानी लगते हैं क्योंकि वह प्रकृति से जुड़े हैं और आधुनिक शिक्षा प्राप्त आदमी तो एकदम अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गये हैं। इसका प्रमाण यह है कि आजकल हिंसा में लगे अधिकतर युवा आधुनिक शिक्षा से संपन्न हैं। इतना ही नहीं अब तो अपराध भी आधुनिक शिक्षा से संपन्न लोग कर रहे हैं।
            जिन लोगों के शिक्षा प्राप्त नहीं की या कम शिक्षित हैं वह अब अपराध करने की बजाय अपने काम में लगे हैं और जिन्होंने अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त की और इस कारण उनको आधुनिक उपकरणों का भी ज्ञान है वही बम विस्फोट और अन्य आतंकवादी वारदातों में लिप्त हैं। इससे समझा जा सकता है कि उनके अपने आधुनिक ज्ञान का अहंकार किस बड़े पैमाने पर मौजूद है।
      आदमी को अपने ज्ञान का अहंकार बहुत होता है पर जब वह आत्म मंथन करता है तब उसे पता लगता है कि वह तो अभी संपूर्ण ज्ञान से बहुत परे है। कई विषयों पर हमारे पास काम चलाऊ ज्ञान होता है और यह सोचकर इतराते हैं कि हम तो श्रेष्ठ हैं पर यह भ्रम तब टूट जाता है जब अपने से बड़ा ज्ञानी मिल जाता है। अपनी अज्ञानता के वश ही हम ऐसे अल्पज्ञानी या अज्ञानी लोगों की संगत करते हैं जिनके बारे में यह भ्रम हो जाता है वह सिद्ध हैं। ऐसे लोगों की संगत का परिणाम कभी दुखदाई भी होता है। क्योंकि वह अपने अज्ञान या अल्पज्ञान से हमें अपने मार्ग से भटका भी सकते हैं।







 भोगी  तथा  योगी


 इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं-एक भोगी तथा दूसरे योगी। भोगी लोग जीवन में विषयों में लिप्तता को ही सर्वोपरि मानते हैं। भोगी  लोगउपभोग के सामानों का संग्रह ही अपना लक्ष्य मानते हुए अपना जीवन उन्हीं को समर्पित कर देते हैं जबकि योगी लोग भौतिक सामानों का जीवन में आनंद उठाने का साधन मानकर समाज के लिये आदर्श स्थितियों का निर्माण करने में लगे रहते हैं। ज्ञानियों की दृष्टि में बिना सामानों के भी जीवन में उठाया जा सकता है। उल्टे अधिक सामानों का संग्रह चिंता तथा तनाव का कारण होता है। कुछ लोग स्वादिष्ट भोजन के चक्कर में अनेक प्रकार स्वांग रचते हैं जबकि योगी तथा ज्ञानी भोजन को देह पालने की दृष्टि से दवा के रूप में ग्रहण करते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि



क्वचित् पृथ्वीशय्यः क्वचिदपि च पर्वङ्कशयनः क्वच्छिाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।

क्वचित्कन्धाधारी क्वचिदपि च दिव्याभवरधरोः मनस्वी कार्यार्थी न गपयति दुःखः न च सुखम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-कभी प्रथ्वी पर सोना पड़े कभी पलंग पर मखमली बिछोने पर शयन का सौभाग्य मिले, कभी बढ़िया तो कभी सादा खाना मिले, जिनकी रुचि अपने लक्ष्य में रहती है वह कभी इन बातों की परवाह नहीं करते।  मनस्वी पुरुष दुःख सुख की चिंता में न पड़कर कभी सामान्य तो कभी दिव्य वस्त्र पहनकर  अपने जीवन मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक बढ़ते हुए दूसरों के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

      सच बात तो यह है कि उपभोग की प्रवृत्ति मनुष्य को कायर बना देती है। वह किसी बड़े सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक अभियान में लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह पाता। इतना ही अधिक उपभोग मानसिक, वैचारिक तथा अध्यात्मिक से कमजोर भी बनाता है। हम इसे अपने देश में अनेक सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा साहित्यक अभियानों का नेतृत्व करने वाले कथित  शीर्ष पुरुषों की क्षीण वैचारिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक स्थिति को देखकर समझ सकते है। यह सभी कथित शीर्ष पुरुष बातें बड़ी बड़ी करते हैं पर किसी का अभियान लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता।  इसका कारण यह है कि जिनका जीवन सुविधाओं के साथ व्यतीत होता है वह अपने कथित अभियानों की वजह से लोकप्रियता भले ही प्राप्त कर लें पर उनमें इतनी क्षमता नहीं होती कि वह अपने सिद्धांतों या वादों को धरातल पर उतार सकें।  इसके लिये जिस त्याग भाव की आवश्यकता होती है वह केवल उन्हीं लोगों में हो सकता है जो सुविधायें मिलने की परवाह न करते हुए मनस्वी हो जाते हैं।हमारे अध्यात्मिक महापुरुषों की शिक्षा को भले ही प्राचीन मानकर भुला दिया गया हो पर वह उसके सूत्र आज भी प्रासंगिक है।  हम नये वातावरण में नये सूत्र ढूंढते हैं पर इस बात को भूल जाते हैं प्रकृत्ति तथा जीव का मूल जीवन जिन तत्वों पर आधारित है वह कभी बदल नहीं सकते। हमने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखे हैं और कहते हैं कि संसार बदल गया है।  अध्यात्मिक ज्ञान साधक ऐसा भ्रम कभी नहीं पालते। उन्हें पता होता है कि आजकल आधुनिकता के नाम पर पाखंड बढ़ गया है। स्थिति यह हो गयी है कि आर्थिक, राजनीतिक साहित्यक, धार्मिक, सामाजिक तथा कला संस्थाओं में ऐसे लोग शिखर पुरुष स्थापित हो गये हैं जो समाज के सामान्य मनुष्य को भेड़ों की तरह समझकर उनको अपना अहंकार दिखाते हैं।  ऐसे लोग बात तो समाज  के हित की करते हैं पर उनका मुख्य लक्ष्य अपने लिये पद, पैसा तथा प्रतिष्ठा जुटाना  होता है। स्थिति यह है कि मजदूर, गरीब तथा बेबस को भगवान मानकर उसकी सेवा का बीड़ा उठाते हैं और उनका यही पाखंड उन्हें शिखर पर भी पहुंचा देता है।  एक बार वहां पहुंचने के बाद ऐसे लोग अहंकारी हो जाते हैं। फिर तो वह अपने से छोटे लोगों से सम्मान करवाने के लिये कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

संत कबीर कहते हैं कि



जग में भक्त कहावई, चुकट चून नहिं देय।

सिष जोरू का ह्वै रहा, नाम गुरु का लेय।।

     सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-कुछ मनुष्य संसार में भला तो  दिखना चाहते हैं पर वह किसी थोड़ा चूना भी नहीं देसकते।  ऐसे लोगों के मस्तिष्क में तो परिवार के हित का ही भाव रहता पर अपने मुख से केवल परमात्मा का नाम लेते रहते हैं।

विद्यामद अरु गुनहूं मद, राजमद्द उनमद्द।

इतने मद कौ रद करै, लब पावे अनहद्द

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-विद्या के साथ  गुण का अहंकार तथा राजमद मनुष्य के अंदर उन्माद पैदा कर देता है।  इस तरह के मद से मुक्त होकर ही परमात्मा का मार्ग मिल सकता है।

      अनेक बुद्धिमान  यह देखकर दुःखी होते हैं कि पहले समाज का भले करने का वादा तथा दावा कर शिखर पर पहुंचने के बाद लोग उसे भूल जाते हैं। इतना ही नहीं समाज के सामान्य लोगों की दम पर पहुंचे ऐसे लोग विकट अहंकार भी दिखाते हैं।  ज्ञान साधकों के लिये यह दुःख विषय नहीं होता। पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा व्यक्ति उन्मादी हो ही जायगा यह वह जानते हैं। ऐसे विरले ही होते हैं जिनको यह अहंकार नहीं आता।  जिनको अर्थ, राजनीति, समाजसेवा, धर्म तथा कला के क्षेत्र में पहली बार शिखर मिलता है तो उनके भ्रम का तो कोई अंत नहीं होता। उन्हें लगता है कि उनका पद तो उनके जन्म के साथ ही जमीन पर आया था। उनमें यह विचार तक नहीं आता कि जिस पद पर वह आज आयें हैं उस पर पहले कोई दूसरा बैठा था।  ऐसे लोग समाज सेवा और भगवान भक्ति का जमकर पाखंड करते हैं पर उनका लक्ष्य केवल अपने लिये पद, पैसा और प्रतिष्ठा जुटाना ही होता है।

      सामान्य लोगों को यह बात समझ लेना चाहिये कि उनके लिये ‘दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ जैसी नीति का पालन करने के  अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं होता। उन्हें पाखंडियों पर अपनी दृष्टि रखने और उन पर चर्चा कर अपना समय बर्बाद करने से बचना चाहिये।
शांत आसन का अभ्यास करें
खुश लोग अक्सर खामोश दिखते हैं पर खुश भी वही रहते हैं। जिन लोगों को बहस सुनने या करने की आदत है वह हमेशा तकलीफ उठाते हैं। अनेक बार तो हम देखते हैं कि लोगों के बीच अनावश्यक विषयों पर वाद विवाद होने पर खूनखराबा हो जाता है। ऐसे वाद विवाद अक्सर अपने लोगों के बीच ही होते हैं। कई बार रिश्ते और मित्रता शत्रुता में परिवर्तित हो जाती है।
मनुष्य का स्वभाव कुछ ऐसा होता है कि वह बचपन से लेकर बुढ़ापे तक एक जैसा ही रहता है। युवावस्था में तो यह सब पता नहीं चलता पर बुढ़ापे में शक्ति क्षीण होने पर मनुष्य के लिये ज्यादा बोलना अत्यंत दुःखदायी हो जाता है। उस समय उसे मौन रहना चाहिए पर कामकाज न करने तथा हाथ पांव न चलाने की वजह से उसे बोलकर ही अपना दिल बहलाना पड़ता है और परिणाम यह होता है कि उसे अपमानित होने के साथ ही मानसिक तकलीफ झेलनी पड़ती है। दरअसल शांत बैठने की प्रवृत्ति का विकास युवावस्था में ही करना चाहिए जिससे उस समय भी व्यर्थ के वार्तालाप में ऊर्जा के क्षीण होने के दोष से बचा जा सकता है और बुढ़ापे में भी शांति मिलती है। शांत बैठना भी एक तरह से आसन है। 
इस विषय  पर मनु महाराज कहते हैं कि 
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क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।
“जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।”
उसी तरह मित्रों से भी जरा जरा बात पर विवाद नहीं करना श्रेयस्कर है। आपसी वार्तालाप में मित्र ऐसी टिप्पणियां भी करते हैं जो नागवार लगती हैं पर उस पर इतना गुस्सा जाहिर नहीं करना चाहिए कि मित्रता में बाधा आये। घर परिवार के सदस्यों को उनकी गल्तियों पर समझाना चाहिये कि अगर कोई न माने तो शांत ही बैठ जायें क्योंकि यह जीवन हरेक की स्वयं की संपदा है और जिसका मन जहां जाने के लिये प्रेरित करेगा उसकी देह वहीं जायेगी। यह अलग बात है कि परिणाम बुरा होने पर लोग रोते हैं पर यहां कोई किसी की बात नहीं मानता। ऐसे में शांत आसन का अभ्यास बुरा नहीं है।
क्या है नागा साधू की मूल अवधारणा - मोह-माया का त्याग या गांजा पीने और नंग-धडंग रहने की छूट?


जब आप कुंभ मेले पर लिखा कुछ भी पढ़ते हैं, तो सबसे पहले संभवतः उन दृश्यों का ख़्याल आपके मन में आता होगा जिन्हें समाचारों में ज़्यादातर दिखाया जाता है: गंगा की ओर दौड़ लगाते हुए हज़ारों नंगे पुरुष। अधिकतर लोगों को इस तथ्य की जानकारी है कि वो केवल पवित्र स्नान के लिए नंगे नहीं हुए हैं बल्कि निःवस्त्र रहना ही उनका वस्त्र है। उन्हें नागा साधू कहा जाता है और वो इतने रोचक तो हैं हीं कि मैं उन पर और उनके दर्शन पर एक लेख लिखूं।
नागा को सरल अर्थों में नंगा कह सकते हैं, तो वो सब नंगे साधू हैं। आप ये भी कह सकते हैं कि वो विरक्ति के चरम तक पहुंच चुके साधू हैं। एक साधू का सिद्धांत बेहद स्पष्ट है: वो मोह-माया से दूर रहते हैं। उन्होंने अपने परिवारों से हर प्रकार का संबंध तोड़ लिया है ताकि वो भावनात्मक बंधन से मुक्त रहें, वो हमेशा घूमते रहते हैं ताकि वो किसी भौगोलिक परिवेश से जुड़ाव न महसूस करने लगें और उनके पास धन-संपदा जैसी चीज़ें नहीं होती हैं। वो कुछ जमा करके या बचक करके नहीं रखते, उतना ही रखते हैं जितना हाथों में आता है और जितने से उस वक़्त का गुज़ारा हो जाएगा।
एक नागा साधू दुनियावी चीज़ों से एक क़दम और आगे बढ़ता है और वस्त्रों से भी अपना जुड़ाव समाप्त कर लेता है। अधिक से अधिक विरक्ति की प्रक्रिया में यह एक तार्किक अगला क़दम माना जाता है। जब आपके साथ आपके शरीर पर वस्त्रों के अलावा और कोई जुड़ाव नहीं रह गया तो वस्त्रों का परित्याग ही विरक्ति की दिशा में आपका अगला क़दम होगा। अगर आपके पास वस्त्र हैं, आपको उन्हें धोना होगा, तो ऐसे में आपके पास कपड़ों का एक दूसरा जोड़ा भी होना चाहिए। अगर आपके पास दो जोड़े पतलून हैं, तो एक आप पहनेंगे और दूसरे को रखने के लिए या तो एक थैला रखेंगे या कोई गठरीनुमा कपड़ा। अगर आपके पास एक थैला है तो आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि सोते हुए आप इसे कहां रखना है और यह ध्यान भी रखना होगा कि आप इसे कहीं भूल न जाएं। अगर कोई इसे चुरा लेता है, तो आप इसे एक तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं कर पाएंगे, आपको दुख होगा: अंततः आप मोह-माया के चक्कर में आ ही गए। तो नागा साधू ने ऐसी किसी भी चीज़ों को रखने से ही इन्कार कर दिया।
नागा साधुओं को क़ायदे से ईश्वर के प्रति आकंठ प्रेम और अध्यात्म की गहराई में कुछ इस तरह रहना चाहिए कि उन्हें इस बात से फ़र्क़ ही न पड़े कि वो कैसे दिखते हैं या मौसम में धूप की रूखी तपिश है या ठंड की गला देने वाली कंपकपाहट। न ही उन्हें अपने शरीर से इतना जुड़ाव है कि वे उसे ताप या ठंड से बचाएं।
नागा साधू की मूल अवधारणा ये है और शायद प्राचीन समय में नागा साधू ऐसे ही होते थे। उनके पास कुछ भी नहीं हुआ करता था, कपड़े भी नहीं। आज आप देखेंगे कि उनके पास केवल वस्त्र नहीं हैं, उसके अलावा सबकुछ है। उनमें से कइयों के पास पैसे हैं, सोना है, ज़ेवर हैं, गाड़ी तक है, वो असल में विलासी साधू हैं! साधारण वस्त्रों वाले साधू ने कुंभ मेले में अपने अस्थायी पंडालों के निर्माण और उनकी सजावट में लाखों रुपये खर्च किए हैं! ठीक उसी तरह इधर-उधर घूमने वाले नागा साधू घूमते तो नंग-धडंग होकर हैं, लेकिन उनकी उंगली पर बेशकीमती अंगूठियां होंगी और अपना यौनांग दिखाने के लिए वो आपसे पैसे मांगेंगे। नागा साधुओं को मालूम है फ़ोटोग्राफ़र को कैसे पोज़ देना है, उन्हें यह भी मालूम है कि पश्चिम से इस मेले को देखने आईं युवा महिलाओं को कैसे अपनी नंगई दिखानी है, चूंकि वो जानते हैं उनकी तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपेंगी, दिखायी जाएंगी। वो नशा करते रहते है, इसलिए सर्दी का उनपर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। क्या इसे विरक्ति कहेंगे?
सुनने में आया है कि इस बार के कुंभ मेले में महिला नागा साधुओं की भी एक जमात है, उनका शिविर अलग है, लोगों की पहुंच से दूर। अगर यह सत्य है, तो वे लोगों के बीच क्यूं नहीं आतीं जैसे पुरुष नागा कर रहे हैं? खै़र, क्या यह अजीबोगरीब बात नहीं है कि अगर कोई सामान्य आदमी सार्वजनिक रूप से से नंगा होकर घूमे, तो उसे अश्लील और आपराधिक माना जाएगा जबकि यही काम एक धार्मिक व्यक्ति करे, तो कोई समस्या नहीं! अगर आप ऐसा करेंगे तो यक़ीन मानिए आपको हिरासत में ले लिया जाएगा और ज़ुर्माना भी भरना पड़ेगा। अगर वो करते हैं, तो लोग उनकी तस्वीरें लेते हैं, तस्वीरें व्यापक पैमाने पर दुनिया भर में छपती हैं और लोग बाग़-बाग़ हो जाते हैं, न कि आहत होते हैं।
अजीब दुनिया नहीं है ये?
ग़ैर-हिन्दुओं के पास ऊंची हिन्दु पदवियां - उस धर्म में जो अपनाने से नहीं जन्म से मिलता है
पिछले कुछ समय से मैं कुंभ मेले के ऊपर लिख रहा था, स्पष्ट है कि इस दौरान मैंने हिन्दुओं पर, भारतीयों पर, यहां के तीर्थस्थानों पर और शायद बाहरी देशों में मौजूद तीर्थस्थानों पर भी बहुत लिखा। हालांकि इस दौरान मैंने उन गैर-भारतीय साधुओं और गुरुओं के बारे में नहीं लिखा जो ज़ाहिर है, कुंभ-मेले में तीर्थयात्री या पर्यटक बनकर नहीं आए हैं, बल्कि नुमाइश के इस खेल का हिस्सा हैं।
मैंने पहले भी इसकी व्याख्या की थी कि हिन्दुत्व धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की इजाज़त नहीं देता। आप इस्लाम अपना सकते हैं, ईसाई बन सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व धारण करने का कोई उपाय या विकल्प नहीं है। आप केवल जन्म से ही हिन्दु हो सकते हैं। यही वो कारण है कि बनारस के विश्वनाथ मंदिर, उड़ीसा में पूरी के जगन्नाथ मंदिर और दक्षिण भारत के अधिकतर हिंदु मंदिरों में आज भी गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। और यह संदेश मंदिर के बाहर लगे साइनबोर्ड पर साफ़-साफ़ लिखा होता है जिसके कारण कोई भी विदेशी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता। मैंने एक बार इस तरह के धार्मिक नस्लवाद की व्याख्या की थी, लेकिन यह भी एक प्रकार से धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की अवधारणा को खारिज करता है।
हास्यास्पद बात तो यह है कि हिन्दुत्व के व्यापारी यानी धार्मिक नेताओं और गुरूओं ने नफ़ा-नुक़्सान के चक्कर में अपने धर्म की राह ख़ुद ही छोड़ दी है। अख़बारों में रोज़ इलाहाबाद के कुंभ मेले में अपनी छटा बिखेर रहे अमेरिका, रूस, स्वीडन और अन्य देशों के साधुओं के क़िस्से छप रहे हैं। वो किसी भारतीय गुरू के भक्त नहीं हैं, न कोई सामान्य साधु हैं, वो ख़ुद ही गुरू हैं जिनके बड़े-बड़े पंडाल लगे हैं और वो अपने आस-पास मौजूद भारतीय गुरुओं द्वारा पूरी तरह स्वीकार्य और मान्य हैं, क्योंकि उन्हें उस पद तक लाने में हिन्दुत्व के एक बहुत पुराने धार्मिक संगठन का योगदान है, जिसके पास एक व्यक्ति को महामंडलेश्वर (अनुयायियों के एक समूह का प्रधान) की उपाधि देने का अधिकार है। और उस संगठन ने ऐसी पदवियां विदेशियों को भी दी! हालांकि अब सबको मालूम है कि ऐसी उपाधियां ख़रीदी जा सकती हैं, बस आपके पास पर्याप्त पैसे होने चाहिए।
हिन्दु धर्म तो इस बात तक की अनुमति नहीं देता कि कोई विदेशी मंदिर में प्रवेश करे, तो फिर यह कैसे मुमकिन है कि इसी धर्म का एक प्राचीन संगठन उन्हीं विदेशियों को अपने साथ जोड़ता है और यहां तक कि उन्हें ऊंचे पदों पर बैठाता है? अब वो खुद गुरू हैं और उनके अनेक अनुयायी हैं, कुंभ मेले में उनके तंबू गड़े हैं, बड़े-बड़े पंडाल सजे हैं, उनकी पूजा दुनिया के हर हिस्से में की जाती है- ज़ाहिर है तकनीकी रूप से ग़ैर-हिन्दु गुरुओं के चरणों में आस्थावान भारतीय हिन्दु भी बिछे हैं जो शायद अपने ही धर्म ग्रंथों से अनभिज्ञ हैं।
बात और बदतर तब हो जाती है जब आप इन सबको एकसाथ मिलकर इस त्योहार में अपनी दुकानें चलाते हुए देखते हैं। पश्चिमी गुरुओं और साधुओं की ठाठ भारतीयों से रत्ती भर भी कम नहीं है, वो अपनी रईसी की नुमाइश में और महिला अनुयायियों का आनंद लेने में भारतीयों की तरह ही कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हालांकि इन उपाधियों पर विराजमान संन्यासियों के लिए क़ायदे से एक महिला से बात तक करना उचित नहीं है! एक पश्चिमी गुरू एक चुटकी राख 1100 रुपये में बेचने के लिए विख्यात है - लगभग 20 अमेरिकन डॉलर! इस कुंभ के मेले में वो ख़ूब पैसा बना रहे हैं, जबकि इस दौरान क़ायदे की बात करें तो उन्हें भौतिकवाद से खुद को अलग रखना चाहिए था।
यही कारण है कि मैं धर्म को विशुद्ध व्यवसाय मानता हूं। सब धर्म को अपनी सुविधा के हिसाब से संशोधित करते हैं, अपने हिसाब से उसका मतलब निकालते हैं, अपनी ख़ुद की परंपरा का निर्माण कर लेते हैं और फिर धर्म और भगवान को बेचने वाली दुकान खोलकर बैठ जाते हैं।
मुझे मालूम है कि वो विदेशी जो खुद को हिन्दु बताते हैं, मेरी बातों से सहमत नहीं होंगे, बल्कि उनमें से कोई भी गुरू मेरी बातों से सहमत नहीं होगा जिनकी दुकान धर्म से चलती है। आख़िरी बार जब मैंने इस विषय पर लिखा था तो उनलोगों द्वारा बहुत सी रोषपूर्ण प्रतिक्रियाएं मिली जिन्हें लगा कि मैं सच को बाहर ले आया हूं। मैं यह भी जानता हूं कि धार्मिक लोग, अनुयायीगण नियमित तौर पर मुझे मेरी बातों के लिए खरी-खोटी सुनाते रहेंगे, लेकिन वो उन गुरुओं के सामने सिर और पैर एक करके बिछे रहेंगे, भले ही वो उनसे पैसे ऐंठकर रईसी की नुमाइश करे और धर्म के मूल सिद्धांतों की ऐसी-तैसी करता रहे। घूम-फिरकर मैं दुबारा इसी निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि यह या तो दुखद है या हास्यास्पद - मैं तो हंसना पसंद करूंगा।



मनुष्य की आयु घटाने व बढ़ाने वाले कर्म 

हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों के अनुसार हम मनुष्यों की आयु लगभग 100 वर्ष या उससे अधिक मानी गयी है लेकिन वर्तमान समय में हमारे रहन सहन, विचारों, कर्मों के कारण हमारी आयु में लगातार कमी आती जा रही है। हम अपनी आयु को बढ़ाने, निरोगी रहने के तमाम प्रयत्न भी करते है लेकिन ज्यादातर लोगो को इसमें असफलता ही हाथ लगती है । 

इसका प्रमुख कारण हमारे द्वारा रोज किए जाने वाले कुछ ऐसे कार्य हैं, जो शास्त्रों में बिलकुल निषेध है। महाभारत के अनुशासव पर्व में मनुष्य की आयु को घटाने व बढ़ाने वाले हमारे कर्मों के बारे में पूरे विस्तार से बताया गया है।ये महत्वपूर्ण बातें भीष्म पितामाह जी ने युधिष्ठिर जी को बताई थी।

भीष्म पितामह के अनुसार जो व्यक्ति धर्म को नहीं मानते है नास्तिक है, कोई भी कार्य नहीं करते है, अपने गुरु और शास्त्र की आज्ञा का पालन नहीं करते है, व्यसनी, दुराचारी होते है उन मनुष्यों की आयु स्वत: कम हो जाती है। जो मनुष्य दूसरे जाति या धर्म की स्त्रियों से संसर्ग करते हैं, उनकी भी मृत्यु जल्दी होती है।

जो मनुष्य व्यर्थ में ही तिनके तोड़ता है, अपने नाखूनों को चबाता है तथा हमेशा गन्दा रहता है , उसकी भी जल्दी मृत्यु हो जाती है। जो व्यक्ति उदय, अस्त, ग्रहण एवं दिन के समय सूर्य की ओर अनावश्यक देखते है उनकी मृत्यु भी कम आयु में ही हो जाती है।यह बहुत ही छोटी छोटी बातें है जिनका हमें अवश्य ही ध्यान रखना चाहिए । 

शास्त्रों के अनुसार हम सभी मनुष्यों को मंजन करना,नित्य क्रिया से निवृत होना, अपने बालों को संवारना, और देवताओं कि पूजा अर्चना ये सभी कार्य दिन के पहले पहर में ही अवश्य कर लेने चाहिए। जो मनुष्य सूर्योदय होने तक सोता है तथा ऐसा करने पर प्रायश्चित भी नहीं करता है,जो ये समस्त कार्य अपने निर्धारित समय पर नहीं करते, जो पक्षियों से हिंसा करते है वे भी शीघ्र ही काल के ग्रास बन सकते हैं। 

शौच के समय अपने मल-मूत्र की ओर देखने वाले, अपने पैर पर पैर रखने वाले, माह कि दोनों ही पक्षों की चतुर्दशी,अष्टमी,अमावस्या व पूर्णिमा के दिन स्त्री से संसर्ग करने वाले व्यक्तियों कि अल्पायु होती है।अत: हमें इनसे अवश्य ही बचना चाहिए । 

सदैव ध्यान दें कि भूसा, कोई भी भस्म, किसी के भी बाल और मुर्दे की हड्डियों,खोपड़ी पर कभीभी न बैठें। दूसरे के नहाने में उपयोग किये हुए जल का कभी भी किसी भी रूप में प्रयोग न करें। भोजन सदैव बैठकर ही करे। जहाँ तक सम्भव हो खड़े होकर पेशाब न करें। किसी भी ,राख तथा गोशाला में भी मल, मूत्र-त्याग न करें। भीगे पैर भोजन तो करें लेकिए भीगे पैर सोए नहीं। उक्त सभी बातों का ध्यान में रखने वाला वाला मनुष्य सौ वर्षों तक जीवन धारण करता है।

जो मनुष्य सूर्य, अग्नि, गाय तथा ब्राह्णों की ओर मुंह करके और बीच रास्ते में मूत्र त्याग करते हैं, उन सब की आयु कम हो जाती है।

मैले, टूटे और गन्दे दर्पण में मुंह देखने वाला, गर्भवती स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने वाला,उत्तर और पश्चिम की ओर सर करके सोने वाला, टूटी, ढीली और गन्दी खाट / पलंग पर सोने वाला, किसी कोने ,अंधेरे में पड़े पलंग, चारपाई पर सोने वाला मनुष्य कि आयु अवश्य ही कम हो जाती है। 
मनुष्य की आयु घटाने व बढ़ाने वाले कर्म 

अपवित्र अवस्था में सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्र की ओर देखने वाला, बड़े बुजुर्गो के आने पर खड़े होकर उनको प्रणाम नहीं करने वाला, उनका आदर सत्कार न करने वाला , घर में टूटे फूटे बर्तनों का उपयोग करने वाला, मात्र एक ही वस्त्र पहनकर भोजन करने वाला, नंगे बदन तथा अपवित्र अवस्था में ही सोने वाला मनुष्य भी अल्पायु होता है। सिर पर तेल लगाने के बाद उसी हाथ से बचा हुआ तेल शरीर के दूसरे अंगों पर नहीं लगाना चाहिए। जूठे मुंह, जूठे हाथों से पढ़ने -पढ़ाने से भी आयु का नाश होता है। बोए हुए खेत में, आबादी के पास तथा पानी में मल-मूत्र करने वाला, सामने परोसे हुए अन्न की निंदा करने वाला, भोजन से पूर्व हाथ मुँह न धोने वाला और भोजन करते समय बात करने वाले मनुष्य की आयु भी कम होती है। लंबी आयु चाहने वाले मनुष्यों को जूठन भी घर से दूर ही फेंकना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके ही हजामत बनवाना चाहिए। हजामत बनवाकर बिना नहाए रहने से भी आयु का नाश होता है। व्यक्ति को किसी से ईष्र्या नहीं करना चाहिए। ईष्र्या करने से भी आयु का अवश्य ही नाश होता है। बिना बुलाए कहीं भी नहीं जाना चाहिए किंतु पूजा/यज्ञ देखने के लिए बिना निमंत्रण के भी चला जाना चाहिए है। जहां व्यक्ति का आदर न होता हो, अपमान हो वहां जाने से भी आयु का नाश होता है।निषिद्ध समय में कभी अध्ययन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से भी ज्ञान व आयु का नाश हो जाता है।

शास्त्रों के अनुसार गुरु के साथ कभी भी जिद नहीं करनी चाहिए। यदि गुरु नाराज़ हों तो भी उन्हें हर तरह से सम्मान देकर उन्हें मनाकर प्रसन्न करने की चेष्ठा अवश्य ही करनी चाहिए। गुरु जैसा भी बर्ताव करते हों तो भी उनके प्रति सदैव अच्छा ही बर्ताव करना चाहिए। क्योंकि गुरु की निंदा से मनुष्यों की आयु कम हो जाती है| इसी तरह महात्माओं की निंदा करने से भी मनुष्य की आयु कम होती है। 

जो मनुष्य अपने पर्वों/त्योहारों के दिन ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करता है , किसी भी व्यक्ति के साथ एक ही बर्तन में भोजन करता है, जो ऐसा अन्न खाता है तथा जिसमें से सार निकाल लिया गया हो, भोजन के बाद बाल संवारता है उसकी भी उम्र अधिक नहीं होती है। 

जो मनुष्य यदि शाम के समय सोता है, पढ़ता है या भोजन करता है। रात के समय श्राद्ध करता है, नहाता है व दही या सत्तू खाता है, रात के समय खूब डंटकर भोजन करता है, ऐसा मनुष्य भी अधिक उम्र तक जीवित नहीं रहता है। 

शास्त्रों के अनुसार जो कन्या किसी अंग से हीन हो अथवा अधिक अंग वाली हो, जिसका गोत्र अपने ही समान हो या जो नाना के कुल में ही उत्पन्न हुई हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, जो नीच कुल में पैदा हुई हो, जिसके कुल का पता न हो जिसके शरीर का रंग पीला हो तथा जो कुष्ठ रोग वाली हो, उसके साथ विवाह करने से मनुष्य की आयु अवश्य ही कम होती है।

जो मनुष्य अपवित्र मनुष्यों को देखता स्पर्श करता या उनके साथ रहता है, जो बहुत कामी होता है जो वासना में अंधा होकर कुमारी कन्या, चरित्रहीन स्त्री या वेश्या से सम्बन्ध बनाता है, जो पत्नी के साथ दिन में कभी भी तथा रजस्वला अवस्था में समागम करता है, उसे भी अवश्य ही अल्प आयु प्राप्त होती है।

जो मनुष्य भोजन करने के बाद हाथ-मुंह धोए बिना अपवित्र रहता है, और ऐसी अवस्था में ही अग्नि, गाय तथा ब्राह्मण का स्पर्श करता है ऐसे व्यक्ति को यमदूत शीघ्र ही ले जाते हैं। 

पलंग पर सदैव सीधा ही सोना चाहिए कभी भी तिरछा नहीं सोना चाहिए। नास्तिक मनुष्यों के साथ कभी भी संगत नही करनी चाहिए। आसन को कभी भी पैर से खींचकर नहीं बैठना चाहिए। स्नान किए बिना मनुष्य को चंदन नहीं लगाना चाहिए। बार-बार अपने मस्तक पर पानी नहीं डालना चाहिए। जो भी मनुष्य जाने अनजाने ये काम करता है, उसकी आयु भी अवश्य ही कम होती हैं। 
दीर्घ आयु के उपाय 

दिन में उत्तर दिशा की ओर मुंह करके मल-मूत्र का त्याग करने और रात में दक्षिणामुख होकर करने से आयु का नाश नहीं होता। दातून, मंजन किए बिना देवताओं की पूजा कदापि भी नहीं करनी चाहिए। नदी तालाब में नंगा होकर अथवा रात के समय नहाने से यथा संभव बचना चाहिए। नास्तिक मनुष्यों कि संगत से दूर रहने में ही भलाई है । नहाने के बाद गन्दे ,गीले वस्त्र कभी भी नहीं पहनना चाहिए। रजस्वला स्त्री के साथ कभी भी सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहियें। उपरोक्त बातों का ध्यान रखने वाला मनुष्य 100 वर्षों तक आयु का सुख भोगता है। 

क्रोधहीन, सत्य बोलने वाले, प्राणियों से हिंसा न करने वाला, सभी को एक समान रूप से देखने वाला तथा छल कपट से दूर रहने वाले मनुष्य की आयु 100 वर्षों की होती है। प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर फिर नित्यकर्म - स्नान आदि करने के बाद प्रात:काल की संध्या व शाम के समय भी विधिपूर्वक संध्या करने वाले मनुष्य भी दीर्घ आयु को प्राप्त होते है।

कभी भी दूसरों के पहने हुए वस्त्र व जूते नहीं पहनने चाहिए। दूसरों की निंदा व चुगली बिलुक भी नहीं करनी चाहिए। किसी से भी क्रूरता का व्यवहार नही करना चाहिए। असहाय, अपंग व कुरूप की कदापि हंसी नहीं उड़ानी चाहिए। ब्राह्मण, गाय, राजा, स्त्री, दुर्बल, वृद्ध, गर्भिणी और बोझ लिए हुए मनुष्य यदि सामने आ जाएं तो उन्हें मार्ग देने के लिए स्वयं पीछे हट जाना चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने वाले मनुष्य को अल्पायु नहीं होती है ।

अधिक उम्र चाहने वाले मनुष्य को पीपल, बड़ और गूलर के फल का तथा सन के साग का सेवन कभी भी नहीं करना चाहिए। हाथ में नमक लेकर नहीं चाटना चाहिए इससे बुद्धि, धन और आयु का नाश होता है। रात को चावल, दही, मूली और सत्तू नहीं खाना चाहिए। सुबह और शाम के समय ही सावधानी के साथ भोजन करना चाहिए, बीच में कुछ भी अनावश्यक खाना उचित नहीं है। शत्रु के श्राद्ध में कभी भूलकर भी अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।उपरोक्त निर्देशों का पालन करने वाला सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। 

बूढ़े-बुजुर्गो , परिवार के सदस्य और गरीब मित्र को अपने घर में अवश्य ही आश्रय देना चाहिए। परेवा, तोता और मैना आदि पक्षियों को घर में रहना बहुत ही मंगलकारी होता है। लेकिन यदि उल्लू, गिद्ध और जंगली कपोत घर में आ जाए तो तुरंत उसकी शांति करवानी चाहिए क्योंकि ये अमंगलकारी माने गए हैं। 



क्या है भद्रा 

हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार किसी भी शुभ कार्य में भद्रा योग का अवश्य ध्यान रखा जाता है। क्योंकि भद्रा काल में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ या अंत अशुभ माना जाता है। इसलिए भद्रा काल में कोई भी आस्थावान, बुद्धिमान व्यक्ति शुभ कार्य बिलकुल भी नहीं करता है।

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनि देव की बहन है। भगवान शनि देव की तरह ही इसका स्वभाव भी उग्र कहा गया है। अत: उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही परम पिता भगवान ब्रह्मा ने उन्हें पंचाग के एक प्रमुख अंग विष्टी करण में स्थान दिया है। कहते है कि जब भद्रा किसी पर्व काल में स्पर्श करती है तो जब तक वह रहती है उसे श्रद्धावास माना जाता है।

भद्रा का समय 7 से 13 घंटे 20 मिनट तक माना गया है, लेकिन बीच में नक्षत्र व तिथि के अनुक्रम तथा पंचक के पूर्वार्द्ध नक्षत्र के मान व गणना के कारण इसके समय में घट-बढ़ होती रहती है। भद्रायुक्त पर्व काल का वह समय छोड़ देना चाहिए, जिसमें भद्रा के मुख तथा मध्य का काल आता हो।

हिन्दु पंचांग के पांच प्रमुख अंग माने जाते हैं। यह है - तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इनमें करण एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है । यह तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या 11 होती है। यह चर और अचर दो भागों में बांटे गए हैं। इन 11 करणों में सातवें करण 'विष्टि' का नाम ही भद्रा है। भद्रा सदैव गतिशील रहती है। हिन्दु पंचाग शुद्धि में भद्रा का खास महत्व माना जाता है। 

वैसे तो भद्रा का शाब्दिक अर्थ कल्याण करने वाली है लेकिन इस अर्थ के बिलकुल विपरीत भद्रा या विष्टी करण में लगभग सभी शुभ कार्य निषेध माने जाते हैं। हमारे ज्योतिष विज्ञान के अनुसार भद्रा अलग-अलग सभी राशियों के अनुसार तीनों लोकों में घूमती है। लेकिन जब यह मृत्युलोक में होती है, तब सभी शुभ कार्यों में बाधक, उनका नाश करने वाली कही गई है। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार जब चन्द्रमा, कर्क, सिंह, कुंभ व मीन इन चार राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टी करण का योग बनता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। और इस समय सभी कार्य शुभ कार्य निषेध होते है। भद्राकाल में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और रक्षा बंधन आदि शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। लेकिन भद्राकाल में स्नान करना, यज्ञ करना, स्त्री प्रसंग, अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करना, शल्य क्रिया करना , कोर्ट में मुकदमा दायर करना, अग्नि जलाना , किसी वस्तु को काटना, भैंस, घोड़ा, ऊंट संबंधी कार्य करने के योग्य माने जाते हैं।

भद्रा के बारह नाम : - धान्या, दधि मुखी, भद्रा, महामारी, खरानना, कालरात्रि, महारूद्रा, विष्टिकरण, कुलपुत्रिका, भैरवी, महाकाली, असुरक्षयकारी हैं। 

भद्रा दोष निवारण के उपाय :शास्त्रों के अनुसार जिस दिन भद्रा हो और यदि उस दिन कोई शुभ कार्य करना ही पड़े तो उस दिन उपवास अवश्य ही करना चाहिए।
एक बात अवश्य ही ध्यान दे कि यदि भद्रा के समय कोई अति आवश्यक कार्य करना ही हो तो भद्रा की प्रारंभ की 5 घटी जो भद्रा का मुख होती है, उसे अवश्य ही त्यागना चाहिए।

भद्रा 5 घटी मुख में, 2 घटी कंठ में, 11 घटी ह्रदय में और 4 घटी पुच्छ में स्थित रहती है। यदि भद्रा के समय कोई अति आवश्यक कार्य करना हो तो भद्रा की प्रारंभ की 5 घटी जो भद्रा का मुख होती है, अवश्य त्याग देना चाहिए।

- जब भद्रा मुख में होती है तो कार्य का नाश होता है।
- जब भद्रा कंठ में होती है तो धन-समृद्धि का नाश होता है। 
- जब भद्रा हृदय में होती है तो प्राण का नाश होता है।
- जब भद्रा पुच्छ में होती है, तो सभी कार्यों में विजय प्राप्त होती है ।

कृष्णपक्ष की तृतीया,दशमी के उत्तरार्ध में एवं सप्तमी,चतुर्दशी,के पूर्वार्ध में भद्रा रहती है ।
शुक्लपक्ष की चतुर्थी, एकादशी के उत्तरार्ध में एवं शुक्लपक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्ध में भद्रा रहती है ।

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