प्राचीन काल से लेकर अब तक भारतीय समाज तंत्र विद्या, काली शक्तियों और जादू-टोने जैसी विधाओं में बहुत विश्वास करता है. तर्क विज्ञान का समाज में अपनी पहुंच बना लेने के बावजूद आज भी कई ऐसे प्रश्न हैं जिनका जवाब ना तो विज्ञान के पास है और ना ही किसी तर्क-वितर्क के जरिए ऐसी घटनाओं की वजह समझी जा सकती है. जिस देश में हमेशा से ही तंत्र साधना का महत्व रहा हो वहां कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो क्यों हुईं, कैसे हुईं, इनके पीछे वजह क्या है, यह सब सवाल मस्तिष्क में चोट तो करते हैं लेकिन इनका जवाब कभी कोई नहीं जान पाता. आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बताएंगे जहां तंत्र-साधना से जुड़े कई ऐसे रहस्य छिपे हैं जिनका जवाब आज तक कोई नहीं ढूंढ़ पाया है.

 

देश का पहला शून्य मंदिर जिसे गुरु मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, ऐसा ही एक स्थान है जहां कई वर्षों से तंत्र साधना की जाती रही है. आपको यकीन नहीं होगा लेकिन सच यही है कि इस मंदिर का निर्माण तक सिर्फ तंत्र साधना के ही उद्देश्य से करवाया गया था. तीन मंजिला इस मंदिर का हर दरवाजा, यहां तक कि इसकी आकृति भी अष्टकोणीय है. पुरातत्व वैज्ञानिक, इतिहासकार और यहां तक कि जादू-टोने में सिद्ध व्यक्ति भी यह जानने की कोशिश में हैं कि इस मंदिर में कौन-कौन सी तांत्रिक क्रियाएं होती थीं.

 

क्षेत्रीय जानकारों का कहना है कि इस मंदिर के हर तल पर अलग-अलग देवताओं के मंदिर हैं. प्रथम तल पर गुरु वरिष्ठ, दूसरे तल पर राधा और तीसरे तल पर किसी देवता की मूर्ति नहीं है इसीलिए इसे शून्य का प्रतीक माना जाता है.


इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें मौजूद आठ द्वारों में से मात्र एक गुरु का था और बाकी सात सप्तपुरियों (अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका और पुरी) के नाम पर रखे गए थे.


बंगाल के तत्कालीन महाराज जयनारायण घोषाल ने जब सन 1814 में इस मंदिर का निर्माण करवाया था तब यह चौरासी बीघा जमीन पर फैला था लेकिन अब इसका ढांचा टूटने लगा है. योग और तंत्र साधना करने के उद्देश्य से बनाए गए ऐसे मंदिर भारत में सिर्फ दो जगहों पर ही हैं. पहला यही मंदिर जो बंगाल के हतेश्वरी में स्थित है और दूसरा दक्षिण भारत के भदलपुर में है.

 

योग साधकों और तांत्रिकों का मानना है कि इस मंदिर के तीनों तलों पर स्थित मंदिरों में सबसे ज्यादा अहमियत शून्य मंदिर का है क्योंकि शून्य को प्राप्त कर लेना ही सबसे बड़ी तपस्या है. ब्रह्मांड शून्य है, पृथ्वी शून्य है. उनका कहना है कि शून्य की साधना अद्भुत है, इसका संबंध सीधे ईश्वर पर केन्द्रित है, इसीलिए शून्य को प्राप्त कर लेने वाला ही सबसे बड़ा साधक है. तंत्र साधना करने वालों का कहना है कि कोई भी साधना तभी पूरी मानी जाती है जब आपका कोई गुरु या मार्गदर्शक हो. पहले तल पर गुरु और तीसरे तल पर शून्य के होने का यही अर्थ है कि गुरु से होती हुई यह साधना शून्य पर जाकर खत्म होती है और शून्य को प्राप्त कर लेना साधना की चरम सीमा है. यह वो अवस्था है जब हर चीज अनंत होने लगती है. मंदिर के हर तल पर अष्टकोणीय सात ऐसे खाने बने हैं जहां बैठकर प्राचीन काल में लोग तांत्रिक क्रियाएं और योग साधनाएं किया करते थे. इस मंदिर के भीतर बंगला भाषा में गुरु के शब्द भी लिखे हैं और कुछ ऐसी आकृतियां भी बनी हुई हैं जिनके पीछे के रहस्य आज तक शोध का ही एक विषय बने हुए हैं. इनके पीछे छिपी हकीकत को समझा नहीं जा पा रहा है.

 






दोस्तों की भीड़ में दुश्मनों को पहचानना मुश्किल हो जाता है. आप नहीं समझ सकते कि कब कौन आपके पीठ पीछे वार कर आपको धोखा देकर चला जाए. दोस्ती और प्यार के नाम पर दगा देने वाले भी बहुत लोग होते हैं. आपकी कोई बात किसी को कितनी बुरी लग गई और इसका बदला लेने के लिए वो किस हद तक पहुंच जाएगा आप इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते.

 


बगलामुखी, एक ऐसी तंत्र साधना है जिसके जरिए लोग वशीकरण, मारण, उच्चाटन आदि जैसी क्रियाओं को अंजाम देते हैं. अपने दुश्मन को हर तरह की हानि पहुंचाने के लिए लोग इस तंत्र साधना का प्रयोग करते हैं और तंत्र-मंत्र पर विश्वास करने वाले लोगों की मानें तो इससे बेहतर और कोई विकल्प हो भी नहीं सकता.

मरने के बाद वो उसकी लाश के साथ रहता था !!



तांत्रिक साधना करने वाले लोगों का कहना है कि मुकद्दमा जीतना हो या फिर किए गए टोने के असर को शिथिल करना हो तो बगलामुखी इसका रामबाण इलाज है. जानकारों की मानें तो बाहरी शत्रु इतना नुकसान नहीं पहुंचा सकते जितना आपके अपने साथी और संबंधी पहुंचा सकते हैं. अगर परिवार का कोई सदस्य अपने ही परिवार के सदस्य के साथ कुछ गलत कर रहा है तो भी बगलामुखी के द्वारा उस टोने के असर को पलटा जा सकता है.


कर्ण पिशाचिनी भविष्य नहीं देख सकती



बगलामुखी साधना के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां:
1. बगलामुखी साधना के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्याधिक आवश्यक है.
2. इस क्रम में स्त्री का स्पर्श, उसके साथ किसी भी प्रकार की चर्चा या सपने में भी उसका आना पूर्णत: निषेध है. अगर आप ऐसा करते हैं तो आपकी साधना खण्डित हो जाती है.
3. किसी डरपोक व्यक्ति या बच्चे के साथ यह साधना नहीं करनी चाहिए. बगलामुखी साधना के दौरान साधक को डराती भी है. साधना के समय विचित्र आवाजें और खौफनाक आभास भी हो सकते हैं इसीलिए जिन्हें काले अंधेरों और पारलौकिक ताकतों से डर लगता है, उन्हें यह साधना नहीं करनी चाहिए.
4. साधना से पहले आपको अपने गुरू का ध्यान जरूर करना चाहिए.
5. मंत्रों का जाप शुक्ल पक्ष में ही करें. बगलामुखी साधना के लिए नवरात्रि सबसे उपयुक्त है.
6. उत्तर की ओर देखते हुए ही साधना आरंभ करें.
7. मंत्र जाप करते समय अगर आपकी आवाज अपने आप तेज हो जाए तो चिंता ना करें.
8. जब तक आप साधना कर रहे हैं तब तक इस बात की चर्चा किसी से भी ना करें.
9. साधना करते समय अपने आसपास घी और तेल के दिये जलाएं.
10. साधना करते समय आपके वस्त्र और आसन पीले रंग का होना चाहिए.


 

शिव जगत पिता हैं
तथा इस संसार की संरचना में उनकी इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए उनकी शक्ति ही प्रकृति का रूप धारण करती है। यह शक्ति ईश्वर की प्रतिछाया बनकर महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में इस सृष्टि के संचालन में प्रभु का सहयोग करती है। प्रकृति ईश्वर की माया शक्ति, जीवन शक्ति एवं नैसर्गिक गुण है। जिस प्रकार सूर्य एवं उसकी रोशनी, आग एवं उसकी प्रज्जवलन क्षमता को अलग नहीं किया जा सकता ​है उसी प्रकार प्रकृति को भी उस चैतन्य प्रभु की छवि के रूप में देखा जा सकता है।

प्रकृति शब्द का यदि संधि विच्छेद किया जाए तो प्र+कृति बनता है। प्र का अर्थ है सर्वोच्च, असाधारण एवं सर्वोत्कृष्ट एवं कृति का अर्थ है रचना। इस प्रकार प्रकृति ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है। इसे और अधिक गहराई से देखें तो प्र का अर्थ है सत्व, कृ का अर्थ है राजस एवं ति का अर्थ है तमस। अर्थात ईश्वर की वह सर्वोच्च कृति जो कि तीनों गुणों की अधिष्ठात्री एवं संचालिका है। मनुष्य को इस संसार के कालचक्र से यही शक्ति मुक्ति दिला सकती है इस शक्ति को वेदों मे महाविद्या की संज्ञा दी गई है।मनुष्य के मष्तिष्क, शरीर एवं अन्तर्मन पर इसी शक्ति का आधिपत्य है। अपने नित्य स्वरूप में यह भक्तों को कर्म फल से मुक्ति दिलाती है। संसार चक्र में घोर कष्ट पा रही जीवात्मा इसी देवी की आराधना करके सांसरिक बंधनों से मुक्ति पाकर उस परमपिता परमेश्वर की ओर अग्रसर हो सकती है।


यह शक्ति मनुष्य के अन्तर्मन मे स्थापित होकर उसकी बुद्धि, मेधा, घृती, स्मृति, लक्ष्मी, शोभा, श्रद्धा, क्षमा आदि सभी गुणों को नियंत्रित करती है।

यही देवी मनुष्य की 72 हजार नाड़ियों की स्वामिनी है। यही आध्याशक्ति विश्व के ज्ञान की प्रवर्तक एवं संचालिका है। परम पिता परमेश्वर से लेकर विश्व के कण-कण फर इसी शक्ति का आधिपत्य है। आधुनिक विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकारता है क्योंकि विज्ञान के अनुसार भी शक्ति के अभाव में वस्तु का कोई महत्व नहीं है। शक्ति विन्यास ही स्वयं वस्तु का स्वरूप निर्धारित करता है।

तंत्र-शास्त्र
तंत्र-शास्त्र में इसी शक्ति की आराधना की जाती है। तंत्र-शास्त्र से तात्पर्य उन गूढ़ साधनाओं से है जिनके द्वारा इस संसार को संचालित करने वाली विभिन्न दैवीय शक्तियों का आव्हान किया जाता है। तंत्र-शास्त्र में विभिन्न पूजा विधियों का इस प्रकार से प्रयोग किया जाता है जिससे वह साधक के मन, मष्तिष्क एवं व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन ला सकें। जिससे उसमें सद्गुणों का विकास हो एवं वह जीवन के परम पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की क्रमिक प्राप्ति कर सके।

तंत्र साधना के समय उच्चारित मंत्र, विभिन्न मुद्रायें एवं क्रियाएं अत्यंत व्यस्थित, नियमित एवं नियंत्रित तरीके से होती हैं। इसमें जरा सी भी चूक होने से परिणाम अत्यंत नकारात्मक हो सकते हैं अत: इस प्रक्रिया के समय साधक को अत्यंत सजग एवं सचेत रहने की आवश्यकता होती है।

किसी भी साधक के लिए तंत्र साधना को यंत्रवत करना असंभव है। इस प्रकार तंत्र साधना के द्वारा साधक में जागरूकता, सजगता, चेतना एवं नियमबद्दता आदि गुणों का विकास किया जाता है।

आधुनिक युग में कुछ लोगों ने तंत्र साधना का दुरुपयोग करके तंत्र साधना की विश्वसनीयता के बारे में सवाल खड़े कर दिए हैं। परंतु शास्त्रों में वर्णित तंत्र साधनाएँ इस प्रकार की साधनाओं से पूर्णतः भिन्न हैं। तंत्र में श्मशान, उजाड़ स्थान आदि को इसलिए चुना जाता है जिससे कि साधक का जीवन के अंतिम सत्य से साक्षात्कार हो सके तथा उसे ईश्वर की सार्वभौमिकता एवं जीवन की निरर्थकता का आभास हो।

इस प्रकार सच्चा तांत्रिक एक सात्विक व्यक्ति होता है एक योगी होता है जो कि ईश्वर के दैवी रूप की साधना करता है। तथा इस तंत्र साधना का उद्देश्य साधक मे सद्गुणों का विकास करना, उसे सांसारिक मोह माया से दूर करना एवं अध्यात्म की ओर अग्रसर करना है।

तंत्र मे ईष्ट का अर्थ ज्योतिष मे प्रयुक्त ईष्ट से भिन्न है। ज्योतिष मे ईष्ट का अर्थ सुकर्मों में वृद्धि एवं आशीर्वाद प्राप्त करना है। जबकि तंत्र में ईष्ट का अर्थ बुराई एवं कष्ट का अंत है। तंत्र शास्त्र की मान्यता है कि बुराई एवं कष्ट अविद्या का परिमाण है। तथा इस अविद्या, बुराई एवं कष्टों से मुक्ति शक्ति की आराधना से ही मिल सकती है।

शक्ति का शाब्दिक अर्थ है दैवीय शक्ति, उन्नति एवं बल। इस शक्ति को भगवती भी कहा जा सकता है जिसका अर्थ भी उन्नति, धन, बल एवं यश प्रदान करना है।
 शिवधनुष तोड़क राम के उपासक तुलसी ने शिव से लगवायी मानस पर मोहर : जो प्रेम में भी नकारा गया और भक्ति में भी दुत्‍कारा गया, उसकी बदतर हालत की कल्‍पना तो हर कोई कर सकता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर तो लोग यह कह कर खारिज कर सकते हैं कि माया मिली ना राम। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा ही एक शख्‍स आखिरकार ऊंचाई के उस मुकाम तक पहुंच गया, जहां सोच पाने तक का साहस शायद कोई नहीं कर सकेगा। उसे राम का वह नाम मिल गया जहां उसके बिना कोई राम का नाम तक नहीं ले सकता है। चार शताब्‍दी बीत जाने के बावजूद उसका नाम राम के साथ ठीक वैसा ही जुड गया है, जैसा सीता या हनुमान का नाम। बिलकुल सही पहचाना आपने। हम शाहों के उस शाह का जिक्र कर रहे हैं जिसे आज पूरी दुनिया गोस्‍वामी तुलसीदास के नाम से जानती है।
विवाह के बाद पत्‍नी जब पहली बार अपने मायके गयी तो पत्‍नी-विरह से विह्वल तुलसीदास से रहा नहीं गया। वे अपने इसी प्रेम के चलते सांप की पूंछ पकड़ कर भले ही अपनी ससुराल पहुंच गये, लेकिन आखिरकार पत्‍नी ने ही उनकी इस हरकत पर दुत्‍कार लगा दी। झिड़कते हुए बोली कि मेरे बजाय अगर तुमने अपना ध्‍यान प्रभु राम पर लगाया होता तो जीवन ही सार्थक हो गया होता। चित्रकूट में तो चरित्र जाता दिखा, तो बेइज्‍जती और शर्म के मारे तुलसीदास सीधे भोलेनाथ की नगरी काशी पहुंच गये और राम की उपासना में लीन होना चाहा। लेकिन वहां शैव उपासकों ने उन्‍हें चैन से रहने ही नहीं दिया। जहां भी धूनी रमायी, उजाड़ दी गयी। ऐसा एक नहीं, अनेक बार हुआ। अब यह भले ही समझ से परे हो, लेकिन अयोध्‍या के बजाय तुलसीदास ने वाराणसी को क्‍यों चुना। शायद इसलिए कि वे इतने अपमान के बाद अपने जीवन का ध्‍येय अपमान मार्ग से ही हासिल करना चाहते रहे हों। बहरहाल, तुलसीदास पर इन अपमानों का आखिरकार कितना जबर्दस्‍त असर पड़ा होगा, यह उनकी इन लाइनों में देखा जा सकता है।
धूत कहो, अवधूत कहो,
राजपूत कहो, जुलहा कहो कोऊ।
काहू की बेटी से बेटा ना ब्‍याहब,
काहू की जात बिगार ना सोउ।
तनिक दिल पर हाथ रख कर सुनिये कि अपने बारे में तुलसीदास जी की एकमात्र यही उक्ति अब तक मिली है। कुछ भी हो, वेदों की नगरी काशी में तुलसी का हठ योग कुछ इस कदर हावी हुआ कि उन्‍होंने संस्‍कृत की बजाय रामचरित मानस को अवधी में लिखा। बस यहीं से उनके विरोध की नींव पड़ गयी। काशी में उनका जबर्दस्‍त विरोध हुआ। संस्‍कृत की नगरी काशी के पंडितों ने इसे बकवास करार दे दिया। उन विद्वानों ने ऐलानिया कहा कि इसे कोई भी स्‍वीकार नहीं करेगा। लेकिन इन चुनौतियों का सामना हर मोड़ पर तुलसी ने किया और अपने राम अभियान को और भी तेज लहकाते रहे। बनारस में ही इस असाधारण जीवट वाले साधु ने अपने लिये संकट मोचन तैयार किया और लंका भी। यानी अपनी सारी भक्तिगत सोच की जमीन वहीं अपने आसपास ही तैयार कर ली। ग्रंथ तो तैयार होने के पहले ही बकवास करार दिया जा चुका था। लेकिन तुलसी ने फिर अपने विरोध की अलख जगायी और यह साबित करने के लिए कि राम और शिव आदि भगवान एकात्‍म ही हैं, उन्‍होंने विश्‍वनाथ मंदिर में माथा टेका।
यह अजीब ही तो था कि रामचरित मानस में शिव-धनुष तोड़क राम की महिमा लिखने वाले तुलसी ने स्‍वयं के त्राण के लिए खुद शिव की चौखट पर न्‍याय की अर्जी बिलकुल निरपेक्ष भाव से लगायी और किंवदंतियों के अनुसार विश्‍वनाथ मंदिर की चौखट पर रामचरित मानस की प्रति रख दी। बताते हैं कि सुबह जब वे मंदिर पहुंचे तो देखा कि उनके ग्रंथ पर शिव की मोहर लग चुकी है। और अब यह कहने की जरूरत तो हर्गिज नहीं है कि भीषण अपमान और चरम उपेक्षा के दौर से शुरू हुए तुलसी के अपने अभियान की सफलता का अंदाजा आज घर-घर में पूरे सम्‍मान के साथ रखे जाने वाले रामचरित मानस के गुटका के तौर पर देखा जा सकता है। पिछले चार सौ बरसों से रामचरित मानस भारतीय जीवन का एक बड़ा जीवन-सिद्धांत ग्रंथ बन चुका है, जहां इंसान की हर समस्‍या का समाधान है, उसके लिए दिशा-निर्देश हैं और इतना ही नहीं, चमत्‍कारों पर यकीन रखने वालों के लिए जादुई वर्ग पहेली भी है।
दरअसल, सच तो यह है कि राम के प्रेम के साथ ही तुलसीदास जी ने भक्ति की एक ऐसी महान कहानी रच डाली जो इसके पहले कभी सोची ही नहीं गयी थी। उस कहानी का नाम है हनुमान चालीसा। हैरत की बात तो यह है कि एक ओर जहां रामचरित मानस मर्यादित जीवन जीने का एक सम्‍बल बन गया, वहीं हनुमान चालीसा ने भक्ति भाव की सारी सीमाएं ही तोड़ डालीं। इस चालीसा में वे भले ही राम की उपासना से अपनी बात शुरू करते हों, लेकिन दोहे की अगली पंक्ति में ही वे इस भक्ति का माध्‍यम पवनसुत यानी हनुमान की उपासना से कर बैठते हैं और फिर उसकी सारी लाइनें बजरंगबली को ही समर्पित हैं। कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी साहित्‍य में यह अद़भुत संयोग लाख खोजने पर भी नहीं मिलेगा। हां, अब यह अलग बात है कि रामचरित मानस के गुटका को छापने का रिकार्ड बना चुके गीता प्रेस का भी दावा है कि रामचरित मानस अपने मूल में नहीं बचा है, उसमें अनेक दोहा और चौपाई बाद में भी जोड़ी गयी हैं।

शाहन के शाह : 
अपने पति के शव पर बिलखती नि:सन्‍तान रानी के वैधव्‍य से दुखी होकर गुरू को दया तो आ गयी लेकिन बाद में यही दया-भाव उस रानी के प्रति उनकी आसक्ति में बदल गया। जाहिर था कि गुरू ने गुरू-दायित्‍वों को गृहस्‍थ जीवन में तिरोहित कर दिया। गुरू को टोकने का साहस किसी में नहीं था, लेकिन वह चेला ही क्‍या, जो अनाचार को सहन कर जाए। भले ही वह अनाचार खुद उसके गुरू ही करने पर आमादा क्‍यों ना हों। बस फिर क्‍या था, चेले ने लगायी भभूत, उठाया त्रिशूल और लगा दिया हुंकारा :- उठ जाग मछन्‍दर गोरख आया। यह गाथा है उस सात्विकता की जिसकी रक्षा का संकल्‍प किया गोरक्षनाथ ने। बाद में गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध इस चेले ने अपने ही गुरू को उसके गुरूत्‍व का आभास कराने के लिए किसी भी सीमा तक जाने में तनिक भी संकोच नहीं किया। यही वजह रही कि गोरखनाथ संप्रदाय का एक बड़ा खेमा मुसलमानों का है जो पाकिस्‍तान के रावलपिण्‍डी में है।
मूल रूप से शिव के उपासक माने जाते हैं नाथ-सम्‍प्रदाय के लोग। मराठी संत ज्ञानेश्‍वर के अनुसार क्षीरसागर में पार्वती के कानों में शिव ने जो ज्ञान दिया, मछली के पेट में निवास कर रहे मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ के कानों तक पहुंच गया। और इसी के साथ ही मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ बाकायदा गुरू हो गये। अब रही चेले की बात। यह घटना अलग है। गोरखपीठ की मान्‍यता के अनुसार शिव ने ही एक बार धूनी रमाये औघड़ की शक्‍ल में एक नि:संतान महिला को भभूत देते हुए उसे मंगल का आशीष दिया। लेकिन दूसरी महिलाओं ने उस महिला को भरमा दिया कि इन औघड़ों के चक्‍कर में मत पड़ो। महिला ने उस भस्‍म को जमीन में गाड़ दिया। बात खुली तो जमीन खोदी गयी और निकल आये गोरक्षनाथ। इसके बाद से ही साथ हो गया मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ और गोरक्षनाथ का। इन दोनों ने काया, मन और आत्‍मा की सम्‍पूर्ण पवित्रता की जरूरत को समझा और अपने इस संकल्‍प को जन-जन तक पहुंचाने के लिए नगरों-गांवों की धूल छाननी शुरू कर दी। योग और ध्‍यान को इसके केंद्र में रखा गया।
गुरू-चेले का यह सम्‍बन्‍ध अविच्छिन्‍न रूप से चल ही रहा था कि अचानक एक राज्‍य की मैनाकिनी नाम की रानी का करूण रूदन मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ को विचलित कर गया। वह नि:संतान थी और अपने पति के शव पर विलाप कर रही थी। मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ को दया आ गयी। रानी की गोद भरने के लिए वे राजा के शव में प्रवेश कर गये। मैनाकिनी की गोद साल भर बाद लहलहा उठी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वे अपने कर्तव्‍यों को ही भूल गये। रास-लीलाओं ने उन्‍हें घेर लिया। राजमहल में पुरूषों का प्रवेश रोक दिया गया। केवल महिला कर्मचारी या नर्तकियां ही वहां जा सकती थीं। गोरक्षनाथ इस हालत से विचलित थे। गुरू को बचाना था और तरीका सूझ नहीं रहा था। बस एक दिन भभूत लगाया और त्रिशूल उठाकर संकल्‍प लिया गुरू को बचाने का। नर्तकियों के साथ उनके ही वेश में राजमहल में प्रवेश कर गये। रास-रंग और गायन-नर्तन शुरू हुआ।
स्‍त्री-वेश में अपनी अदायें दिखा रहे गोरखनाथ मृदंग भी बजा रहे थे। पूरा माहौल वाह-वाह से गूंज रहा था। कि अचानक राजा के शरीर में वास कर रहे मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ की आंखें फटी की फटी ही रह गयीं। गौर से सुना तो पाया कि एक नर्तकी के मृदंग से साफ आवाज आ रही थी कि जाग मछन्‍दर गोरख आया, चेत मछन्‍दर गोरख आया, चल मछन्‍दर गोरख आया। मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ बेहाल हो गये, सिर चकरा गया। गौर से देखा तो सामने चेला खड़ा है। गुरू शर्मसार हो गये। राजविलासिता छोड़कर चलने को तैयार तो हुए, लेकिन शर्त रखी कि मैनाकिनी के बेटे को नदी पर साफ कर आओ। गोरखनाथ को साफ लगा कि गुरू में मायामोह अभी छूटा नहीं है। उन्‍होंने राजकुमार को धोबी की तरह पाटा पर पीट-पीट कर छीपा और निचोडकर अलगनी पर टांग दिया। मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ नाराज हुए तो गोरखनाथ ने शर्त रख दी कि माया छोड़ों तो बेटे को जीवित कर दूं। मरता क्‍या ना करता। भोगविलास ने गुरू की ताकत खत्‍म कर दी थी। शर्त माननी ही पड़ी। यानी गुरू तो गुरू ही रहा मगर चेला शक्‍कर हो गया। बाद की सारी गाथाएं गोरखनाथ की शान में गढ़ी गयीं।
उधर आस्‍था से अलग तर्कशास्त्रियों के अनुसार ईसा की सातवीं से लेकर बारहवीं शताब्‍दी के बीच ही गोरखनाथ का आविर्भाव हुआ। चूंकि यह काल भारत के लिए काफी संक्रमण का था, इसलिए गोरखनाथ का योगदान देश को एकजुट करने के लिए याद किया जाता है। काया, मन और आत्‍मा की शुद्धि को समाजसेवा और फिर मोक्ष के लिए अनिवार्य साधन बताने का गोरखनाथ का तरीका जन सामान्‍य ने अपना लिया। गोरखनाथ का कहना था कि साधना के द्वारा ब्रहमरंध्र तक पहुंच जाने पर अनाहत नाद सुनाई देता है जो वास्‍तविक सार है। यहीं से ब्रह़मानुभूति होती है जिसे शब्‍दों से व्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता। वे राम में रमने को एकमात्र मार्ग बताते हैं जिससे परमनिधान वा ब्रह्मपद प्राप्‍त होता है। गोरखनाथ ने असम से पेशावर, कश्‍मीर से नेपाल और महाराष्‍ट्र तक की यात्राएं कीं। उनकी बनायी गयीं 12 शाखाएं आज भी जीवित हैं जिनमें उडीसा में सत्‍यनाथ, कच्‍छ का धर्मनाथ, गंगासागर का कपिलानी, गोरखपुर का रामनाथ, अंबाला का ध्‍वजनाथ, झेलम का लक्ष्‍मणनाथ, पुष्‍कर का बैराग, जोधपुर का माननाथी, गुरूदासपुर का गंगानाथ, बोहर का पागलपंथ समुदाय के अलावा दिनाजपुर के आईपंथ की कमान विमलादेवी सम्‍भाले हैं, जबकि रावलपिंडी के रावल या नागनाथ पंथ में ज्‍यादातर मुसलमान योगी ही हैं।

महत्व

ये संस्कार भगवान् की अन्तरंग सेवा में मनुष्य के अधिकार एवं योग्यता सिद्ध करने के कारण बनते हैं। इसमें दूसरा कारण यह भी है कि तापादि पञ्चसंस्कार वेदविहित परमवैदिक संस्कार हैं और धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण तथा पाञ्चरात्रागमपद्धति से पूर्ण समर्थित है। जिस प्रकार अन्य सोलह संस्कार किसी भी कर्म के लिए हमें अधिकारी बनाते हैं, उसी प्रकार ये पञ्च संस्कार भी हमें भगवदाराधना में योग्यता प्रदान करते हैं। ये पञ्चसंस्कार भगवदाराधनाविरोधी पापों का नाश करके हमें पूर्णत: शुद्ध करके ऐकान्तिक भगवत्कैंकर्य में निष्ठा एवं अधिकार प्राप्त कराते है। ताप के द्वारा हमारे शरीर की शुद्धि और समस्त संचित कर्मों नाश होता है। तिलक से हमारे बुद्धि- मस्तिष्क की शुद्धि होती है, मन्त्र से हमारे अन्त:करण, आत्मा की शुद्धि तथा भगवन्नाम से हमें भागवत होने का अधिकार प्राप्त होने के पश्चात् हम यागरूपी भगवत्समाराधना के अधिकारी बन जाते हैं। ये पञ्चसंस्कार हमारी प्रपन्नता के परिचायक हैं और प्रतिफल हमें शरणागतिमार्ग से भटकने से बचाये रहते हैं क्योंकि यह भी विशेष ज्ञातव्य है कि यदि शरणागतिमार्ग में एक बार भी शरणागति का भाव हटा दो शरणागति भंग हो जाती है, अत: आचार्य द्वारा प्राप्त इन चिह्नों को हमेशा धारण करना चाहिए, जिससे कि हमारी शरणागति भंग न हो।
इस प्रकार प्रपत्ति स्वरूप का प्रकाशक है। जिसका चिन्ह धारण करता है, उसी का वस्तु वह माना जाता । जिस प्रकार सेना, पुलिस को राजचिन्ह, राजपोशाक धारण करने के पश्चात् राजकार्य करने का अधिकार प्राप्त होता है। उसी प्रकार यह संस्कार भी भगवद्धर्म अनुष्ठान करने के लिए अनिवार्य रूप से धारण करने के लिए शास्त्र आज्ञा प्रदान करते हैं।
लोक में भी पतिव्रता स्त्रियों के पातिव्रत्य धर्म के लिए चूड़ी, मंगलसूत्र, सिंदूररेखा आदि धारण करना आवश्यक होता है तो मन का भाव भी पति के लिए अव्यभिचारी, अनुकूल तथा शुद्ध होना चाहिए। उसी प्रकार परमेश्वर के विषय में बाह्मचिन्ह शंख चक्रादि धारण हैं। आन्तरिक चिन्ह विषय में वैराग्य के साथ भगवत्प्रेम है।
अन्तरंग संस्कारों में स्वीकृत पञ्च संस्कार ही श्रेष्ठ हैं। वैष्णवत्वसिद्धि में सर्वप्रथम कारण शंख-चक्र धारण, द्वितीय श्रीचूर्ण के साथ भगवान के चरण चिह्न ऊध्र्वपुण्ड्र का धारण, तृतीय भगवत्सम्बन्धी दासान्त नाम, चतुर्थ भगवत्स्वरूप एवं गुणों के प्रकाशक व्यापक मन्त्र का ग्रहण, पाँचवां है भगवत्समाराधन रूप याग संस्कार। ये संस्कार भगवान के अन्तरंग सेवा में मनुष्य का अधिकार एवं योग्यता सिद्ध करने के कारण बनते हैं। यह शास्त्र की आज्ञा हैं।
श्रीरामानुज सम्प्रदाय के श्रीवैष्णवों में पञ्चसंस्कार का महत्व सर्वविदित है क्योंकि सभी भक्त पञ्चसंस्कार संस्कृत रहते हैं। इसमें दूसरा कारण यह भी है कि तापादि पञ्चसंस्कार वेदविहित परमवैदिक संस्कार हैं और धर्मशास्त्र इतिहास, पुराण, तथा पाञ्चरात्रागम से पूर्ण समर्थित है।
सामान्य संस्कार के समान विशेष पञ्चसंस्कार भी संस्कार होने के कारण अन्य कार्य में योग्यता के साधक होते हैं। पञ्चसंस्कार भगवत् आराधना में योग्यता के साधक होते हैं। पञ्चसंस्कार भगवत् आराधना में योग्यता के विरोधी पापों को नाश करके ऐकान्तिक भगवत्कैंकर्य में निष्ठा एवं अधिकार प्राप्त कराते हैं। साथ ही देह और आत्मा के भी संस्कार होने से शरीर और आत्मा दोनों को पवित्र करते हैं। शरीर से वैदिक विधि से भगवान के शंख और चक्र आदि का धारण करने से यमराज का भी भय नहीं रहता। क्योंकि यमराज श्रीवैष्णवों के शासक नहीं हैं।

गुरु का महत्व

गुरु के महत्व पर संत शिरोमणि तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है –
गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जों बिरंचि संकर सम होई।।
भले ही कोई ब्रह्मा, शंकर के समान क्यों न हो, वह गुरु के बिना भव सागर पार नहीं कर सकता। धरती के आरंभ से ही गुरु की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला गया है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण, गीता, गुरुग्रन्थ साहिब आदि सभी धर्मग्रन्थों एवं सभी महान संतों द्वारा गुरु की महिमा का गुणगान किया गया है। गुरु और भगवान में कोई अन्तर नहीं है। संत शिरोमणि तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं –
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबिकर निकर।।
अर्थात् गुरू मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण कमलों की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही उनके वचनों से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।
किसी भी प्रकार की विद्या हो अथवा ज्ञान हो, उसे किसी दक्ष गुरु से ही सीखना चाहिए। जप, तप, यज्ञ, दान आदि में भी गुरु का दिशा निर्देशन जरूरी है कि इनकी विधि क्या है?  अविधिपूर्वक किए गए सभी शुभ कर्म भी व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं जिनका कोई उचित फल नहीं मिलता। स्वयं की अहंकार की दृष्टि से किए गए सभी उत्तम माने जाने वाले कर्म भी मनुष्य के पतन का कारण बन जाते हैं। भौतिकवाद में भी गुरू  की आवश्यकता होती है।
सबसे बड़ा तीर्थ तो गुरुदेव ही हैं जिनकी कृपा से फल अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। गुरुदेव का निवास स्थान शिष्य के लिए तीर्थ स्थल है। उनका चरणामृत ही गंगा जल है। वह मोक्ष प्रदान करने वाला है। गुरु से इन सबका फल अनायास ही मिल जाता है। ऐसी गुरु की महिमा है।
तीरथ गए तो एक फल, संत मिले फल चार।
सद्गुरु मिले तो अनन्त फल, कहे कबीर विचार।।
मनुष्य का अज्ञान यही है कि उसने भौतिक जगत को ही परम सत्य मान लिया है और उसके मूल कारण चेतन को भुला दिया है जबकि सृष्टि की समस्त  क्रियाओं का मूल चेतन शक्ति ही है। चेतन मूल तत्व को न मान कर जड़ शक्ति को ही सब कुछ मान लेनाअज्ञानता है। इस अज्ञान का नाश कर परमात्मा का ज्ञान कराने वाले गुरू ही होते हैं।
किसी गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रथम आवश्यकता समर्पण की होती है। समर्पण भाव से ही गुरु का प्रसाद शिष्य को मिलता है। शिष्य को अपना सर्वस्व श्री गुरु देव के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए। इसी संदर्भ में यह उल्लेख किया गया है कि
यह तन विष की बेलरी, और गुरू अमृत की खान,
शीश दियां जो गुरू मिले तो भी सस्ता जान।
गुरु ज्ञान गुरु से भी अधिक महत्वपूर्ण है। प्राय: शिष्य गुरु को मानते हैं पर उनके संदेशों को नहीं मानते। इसी कारण उनके जीवन में और समाज में अशांति बनी रहती है।
गुरु के वचनों पर शंका करना शिष्यत्व पर कलंक है। जिस दिन शिष्य ने गुरु को मानना शुरू किया उसी दिन से उसका उत्थान शुरू शुरू हो जाता है और जिस दिन से शिष्य ने गुरु के प्रति शंका करनी शुरू की, उसी दिन से शिष्य का पतन शुरू हो जाता है।
सद्गुरु एक ऐसी शक्ति है जो शिष्य की सभी प्रकार के ताप-शाप से रक्षा करती है। शरणा गत शिष्य के दैहिक, दैविक, भौतिक कष्टों को दूर करने एवं उसे बैकुंठ धाम में पहुंचाने का दायित्व गुरु का होता है।
आनन्द अनुभूति का विषय है। बाहर की वस्तुएँ सुख दे सकती हैं किन्तु इससे मानसिक शांति नहीं मिल सकती। शांति के लिए गुरु चरणों में आत्म समर्पण परम आवश्यक है। सदैव गुरुदेव का ध्यान करने से जीव नारायण स्वरूप हो जाता है। वह कहीं भी रहता हो, फिर भी मुक्त ही है। ब्रह्म निराकार है। इसलिए उसका ध्यान करना कठिन है। ऐसी स्थिति में सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करते रहना चाहिए। गुरुदेव नारायण स्वरूप हैं। इसलिए गुरु का नित्य ध्यान करते रहने से जीव नारायणमय हो जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु रूप में शिष्य अर्जुन  को यही संदेश दिया था –
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्याि माम शुच: ।। (गीता 18/66)
अर्थात् सभी साधनों को छोड़कर केवल नारायण स्वरूप गुरु की शरणगत हो जाना चाहिए। वे उसके सभी पापों का नाश कर देंगे। शोक नहीं करना चाहिए।
जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती हैं, वे परम गुरु हैं। जिनकी रग-रग में ब्रह्म का तेज व्याप्त है, जिनका मुख मण्डल तेजोमय हो चुका है, उनके मुख मण्डल से ऐसी आभा निकलती है कि जो भी उनके समीप जाता है वह उस तेज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उस गुरु के शरीर से निकलती वे अदृश्य किरणें समीपवर्ती मनुष्यों को ही नहीं अपितु पशु पक्षियों को भी आनन्दित एवं मोहित कर देती है। उनके दर्शन मात्र से ही मन में बड़ी प्रसनन्ता व शांति का अनुभव होता है। मन की संपूर्ण उद्विग्नता समाप्त हो जाती है। ऐसे परम गुरु को ही गुरु बनाना चाहिए। हमारे बैकुंठवासी श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज में परम गुरु के सभी  गुण मौजूद थे और वर्तमान पीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु रामानुचार्य स्वामी पुरूषोत्तमाचार्य जी महाराज में भी वे सभी गुण प्रत्यत्क्ष दिखाई देते हैं।
नारायण                                                नारायण                                                            नारायण