अखण्डित शिवलिंग पूजनीय है
वृंदा देवी मंदिर
दैत्य जलंधर का जन्म समुद्र मंथन के समय हुआ था, लेकिन श्रीमद देवि भागवत पुराण के अनुसार एक समय शिवजी ने अपने तेज को समुद्र में फैंक दिया जिससे महातेजस्वी बालक का जन्म हुआ, यही बालक जलंधर नाम का पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जलंधर नगरी था। जो अब जालंधर शहर के नाम से विख्यात है।
जलंधर महाराक्षस था, उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना करते हुए श्री हरि से युद्ध किया, परंतु समुद्र मंथन से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपना भाई माना। इस तरह जलंधर राक्षस मां लक्ष्मी को न पा सका। पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की इच्छा रखते हुए कैलाश पर्वत जा पहुंचा, परंतु मां ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहां से अंर्तध्यान हो गईं।
देवी पार्वती ने श्री हरी को सारी बात बताई, जालंधर का अतंक दिन ब दिन बढ़ रहा था। इस दौरान दैत्यराज कालनेमी की पुत्री वृंदा का विवाह जलंधर से हुआ। वे अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जलंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जलंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत ज़रूरी था। कोई अन्य मार्ग न जान श्री हरी ने वृंदा का सतीत्व भंग करने का निर्णय किया। वह ऋषि का वेष धारण कर वन में गये, जहां वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। श्री हरी अपने साथ दो मायावी राक्षस भी ले गये जिन्हें देखकर वृंदा डर गईं।
ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जलंधर के बारे में पूछा। ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा बेहोश हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित कर दें। भगवान ने उसकी विनती मान अपनी माया से पुन जलंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया और स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गए।
वृंदा को इस छल का पता न लगा। जलंधर बने भगवान के साथ वृंदा पति का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जलंधर युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को इस छल का पता चला तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को शिला होने का श्राप दे दिया और स्वयं सति हो गईं। भगवान विष्णु ने वृंदा को वचन दिया कि तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। जो प्राणी मेरे शालिगराम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में यश प्राप्त होगा। जिस स्थान पर वह भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा पैदा हुआ। मान्यता है कि सच्चे मन से 40 दिन तक सती वृंदा देवी के मंदिर में पूजा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
शास्त्रों के मतानुसार जालंधर में 12 तालाबों का उल्लेख है। जालंधर शहर में आने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था। इस स्थान की चारदीवारी के बाहर एक पुराना तालाब था जो अन्नपूर्णा मंदिर को छूता था तथा एक तरफ ब्रह्मकुंड की सीमा में लगता था। आज भी यहां पुरानी छोटी ईटों की सीढ़ियां बनी हुई हैं। एक तरफ गोघाट था, जहां कभी महिलाएं स्नान करती थीं, यह वास्तव में ब्रह्मसरोवर ही था, जिसका पुराणों व इतिहास में वर्णन मिलता है। माता वृंदा देवी का मंदिर जालंधर में कोट किशन इलाके में स्थित है।
जलंधर महाराक्षस था, उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना करते हुए श्री हरि से युद्ध किया, परंतु समुद्र मंथन से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपना भाई माना। इस तरह जलंधर राक्षस मां लक्ष्मी को न पा सका। पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की इच्छा रखते हुए कैलाश पर्वत जा पहुंचा, परंतु मां ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहां से अंर्तध्यान हो गईं।
देवी पार्वती ने श्री हरी को सारी बात बताई, जालंधर का अतंक दिन ब दिन बढ़ रहा था। इस दौरान दैत्यराज कालनेमी की पुत्री वृंदा का विवाह जलंधर से हुआ। वे अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जलंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जलंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत ज़रूरी था। कोई अन्य मार्ग न जान श्री हरी ने वृंदा का सतीत्व भंग करने का निर्णय किया। वह ऋषि का वेष धारण कर वन में गये, जहां वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। श्री हरी अपने साथ दो मायावी राक्षस भी ले गये जिन्हें देखकर वृंदा डर गईं।
ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जलंधर के बारे में पूछा। ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा बेहोश हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित कर दें। भगवान ने उसकी विनती मान अपनी माया से पुन जलंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया और स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गए।
वृंदा को इस छल का पता न लगा। जलंधर बने भगवान के साथ वृंदा पति का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जलंधर युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को इस छल का पता चला तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को शिला होने का श्राप दे दिया और स्वयं सति हो गईं। भगवान विष्णु ने वृंदा को वचन दिया कि तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। जो प्राणी मेरे शालिगराम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में यश प्राप्त होगा। जिस स्थान पर वह भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा पैदा हुआ। मान्यता है कि सच्चे मन से 40 दिन तक सती वृंदा देवी के मंदिर में पूजा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
शास्त्रों के मतानुसार जालंधर में 12 तालाबों का उल्लेख है। जालंधर शहर में आने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था। इस स्थान की चारदीवारी के बाहर एक पुराना तालाब था जो अन्नपूर्णा मंदिर को छूता था तथा एक तरफ ब्रह्मकुंड की सीमा में लगता था। आज भी यहां पुरानी छोटी ईटों की सीढ़ियां बनी हुई हैं। एक तरफ गोघाट था, जहां कभी महिलाएं स्नान करती थीं, यह वास्तव में ब्रह्मसरोवर ही था, जिसका पुराणों व इतिहास में वर्णन मिलता है। माता वृंदा देवी का मंदिर जालंधर में कोट किशन इलाके में स्थित है।
मंदिर में बैठे भगवान केवल एक पत्थर की मूर्ति नहीं
एक राजा था। उसने भगवान कृष्ण जी का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी जी को नियुक्त किया। पुजारी जी बड़े भाव से बिहारी जी की सेवा करने लगे, भगवान का श्रंगार करते, भोग लगाते, उन्हें सुलाते। ऐसा करते-करते पुजारी जी वृद्ध हो गए। राजा हर रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथों मंदिर भेज देता।
पुजारी जी वह माला बिहारी जी को पहना देते, जब राजा दर्शन करने जाते तो पुजारी जी वह माला बिहारी जी के गले से उतार कर राजा को पहना देते। ये प्रतिदिन का नियम था। एक दिन राजा किसी काम से मंदिर नहीं जा सके इसलिए उसने सेवक से कहा, "तुम ये माला लेकर मंदिर जाओ और पुजारी जी से कहना आज हमें कुछ काम है इसलिए हम नहीं आ सकते वो हमारा इंतजार न करें। "
सेवक ने जाकर माला पुजारी जी को दे दी और सारी बात बताकर वापस आ गया। पुजारी जी ने माला बिहारी जी को पहना दी फिर वे सोचने लगा की आज बिहारी जी की मुझ पर बड़ी कृपा है। राजा ने तो आज आना नहीं क्यों न ये माला मैं पहन लूं, इतना सोच कर पुजारी जी ने माला उतार कर स्वंय पहन ली।
अभी पुजारी जी ने माला धारण की ही थी कि इतने में सेवक ने घोषणा की,"राजा जी पधार रहे हैं।"
पुजारे जी ने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली,तो मुझ पर बहुत नाराज होगें हड़बडाहट में पुजारी जी ने अपने गले से माला उत्तार कर बिहारी जी को पहना दी, जैसे ही राजा आये तो माला उतार कर राजा को पहना दी। राजा ने देखा माला में एक सफेद बाल लगा है तो राजा समझ गए की पुजारी जी ने माला स्वंय पहन ली थी। राजा को बहुत गुस्सा आया।
राजा ने पुजारी जी से पूछा,"पुजारी जी! ये सफ़ेद बाल किसका है?"
पुजारी जी को लगा अगर मैं सच बोलूंगा तो राजा सजा देगा इसलिये पुजारी जी ने कहा,"ये सफ़ेद बाल बिहारी जी का है।"
अब तो राजा को और भी गुस्सा आ गया कि ये पुजारी जी झूठ बोले जा रहा है। बिहारी जी के बाल भी कही सफ़ेद होते है।
राजा ने कहा,"पुजारी जी अगर ये सफेद बाल बिहारी जी का है तो सुबह श्रंगार करते,समय में आँऊंगा और देखूँगा कि बिहारी जी के बाल सफ़ेद है या काले,अगर बिहारी जी के बाल काले निकले तो आपको फाँसी की सजा दी जाएगी।"
इतना कह कर राजा चला गया। अब पुजारी जी रोने लगे और बिहारी जी से कहने लगे,"हे प्रभु! अब आप ही बचाइए नहीं तो राजा मुझे सुबह होते ही फाँसी पर चढ़ा देगा।"
पुजारी जी की सारी रात रोने में निकल गयी कब सुबह हो गयी उन्हें पता ही नहीं चला। सुबह होते ही राजा आ गया और बोला, "पुजारी जी में स्वंय देखूगां।"
इतना कह कर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो क्या देखता है बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद है। राजा को लगा, पुजारी जी ने ऐसा किया है अब तो उसे और भी गुस्सा आया और उसने पुजारी जी की परीक्षा लेने के लिए कि बाल असली है या नकली,जैसे ही एक बाल तोडा तो बिहारी जी के सिर से खून कि धार बहने लगी और बिहारी जी के श्री विग्रह से आवाज आई कि,"हे
राजा तुमने आज तक मुझ केवल एक मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ और पुजारी जी की सच्ची भक्ति से भगवान बड़े प्रसन्न हुए।"
मंदिर में बैठे भगवान केवल एक पत्थर की मूर्ति नहीं है, उन्हें इसी भाव से देखो की वे साक्षात बिहारी जी है और वैसे ही उनकी सेवा करो।
पुजारी जी वह माला बिहारी जी को पहना देते, जब राजा दर्शन करने जाते तो पुजारी जी वह माला बिहारी जी के गले से उतार कर राजा को पहना देते। ये प्रतिदिन का नियम था। एक दिन राजा किसी काम से मंदिर नहीं जा सके इसलिए उसने सेवक से कहा, "तुम ये माला लेकर मंदिर जाओ और पुजारी जी से कहना आज हमें कुछ काम है इसलिए हम नहीं आ सकते वो हमारा इंतजार न करें। "
सेवक ने जाकर माला पुजारी जी को दे दी और सारी बात बताकर वापस आ गया। पुजारी जी ने माला बिहारी जी को पहना दी फिर वे सोचने लगा की आज बिहारी जी की मुझ पर बड़ी कृपा है। राजा ने तो आज आना नहीं क्यों न ये माला मैं पहन लूं, इतना सोच कर पुजारी जी ने माला उतार कर स्वंय पहन ली।
अभी पुजारी जी ने माला धारण की ही थी कि इतने में सेवक ने घोषणा की,"राजा जी पधार रहे हैं।"
पुजारे जी ने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली,तो मुझ पर बहुत नाराज होगें हड़बडाहट में पुजारी जी ने अपने गले से माला उत्तार कर बिहारी जी को पहना दी, जैसे ही राजा आये तो माला उतार कर राजा को पहना दी। राजा ने देखा माला में एक सफेद बाल लगा है तो राजा समझ गए की पुजारी जी ने माला स्वंय पहन ली थी। राजा को बहुत गुस्सा आया।
राजा ने पुजारी जी से पूछा,"पुजारी जी! ये सफ़ेद बाल किसका है?"
पुजारी जी को लगा अगर मैं सच बोलूंगा तो राजा सजा देगा इसलिये पुजारी जी ने कहा,"ये सफ़ेद बाल बिहारी जी का है।"
अब तो राजा को और भी गुस्सा आ गया कि ये पुजारी जी झूठ बोले जा रहा है। बिहारी जी के बाल भी कही सफ़ेद होते है।
राजा ने कहा,"पुजारी जी अगर ये सफेद बाल बिहारी जी का है तो सुबह श्रंगार करते,समय में आँऊंगा और देखूँगा कि बिहारी जी के बाल सफ़ेद है या काले,अगर बिहारी जी के बाल काले निकले तो आपको फाँसी की सजा दी जाएगी।"
इतना कह कर राजा चला गया। अब पुजारी जी रोने लगे और बिहारी जी से कहने लगे,"हे प्रभु! अब आप ही बचाइए नहीं तो राजा मुझे सुबह होते ही फाँसी पर चढ़ा देगा।"
पुजारी जी की सारी रात रोने में निकल गयी कब सुबह हो गयी उन्हें पता ही नहीं चला। सुबह होते ही राजा आ गया और बोला, "पुजारी जी में स्वंय देखूगां।"
इतना कह कर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो क्या देखता है बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद है। राजा को लगा, पुजारी जी ने ऐसा किया है अब तो उसे और भी गुस्सा आया और उसने पुजारी जी की परीक्षा लेने के लिए कि बाल असली है या नकली,जैसे ही एक बाल तोडा तो बिहारी जी के सिर से खून कि धार बहने लगी और बिहारी जी के श्री विग्रह से आवाज आई कि,"हे
राजा तुमने आज तक मुझ केवल एक मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ और पुजारी जी की सच्ची भक्ति से भगवान बड़े प्रसन्न हुए।"
मंदिर में बैठे भगवान केवल एक पत्थर की मूर्ति नहीं है, उन्हें इसी भाव से देखो की वे साक्षात बिहारी जी है और वैसे ही उनकी सेवा करो।
सच्चे भक्त को कैसा होना चाहिए ...
सच्चे भक्त का सशक्त उदाहरण श्रीकृष्ण चरित्र में देखने को मिलता है। वे स्वयं अर्जुन के सारथी बने , पाण्डवों की ओर से एक स्वयं सेवक की भांति व्यवहार करते हुए महाभारत युद्ध में भाग लिया। ऐसे निरभिमानी भगवान कृष्ण को नीति के पक्षधर अर्जुन ने अपनी ओर रखकर उनकी सेना दुर्योधन को दे दी , यह स्वाभाविक ही था।
राजसूय यज्ञ होने को था। सबके लिए काम बाँटे जा रहे थे। श्रीकृष्ण ने भोलेपन से अपने लिए भी काम माँगा , लेकिन पाण्डवों ने कहा,"भगवन ! आपके लिए तो हमारे पास कोई भी काम नहीं है। बहुत ज्यादा जोर देने पर उनसे कह दिया गया कि वे अपनी पसंद का काम स्वयं ढूँढ लें।"
सभी ने देखा कि श्रीकृष्ण यज्ञ में आदि से अंत तक अतिथियों के चरण धोने , झूठी पत्तलें उठाने तथा सफाई रखने का काम स्वयं करते रहे।
राजसूय यज्ञ होने को था। सबके लिए काम बाँटे जा रहे थे। श्रीकृष्ण ने भोलेपन से अपने लिए भी काम माँगा , लेकिन पाण्डवों ने कहा,"भगवन ! आपके लिए तो हमारे पास कोई भी काम नहीं है। बहुत ज्यादा जोर देने पर उनसे कह दिया गया कि वे अपनी पसंद का काम स्वयं ढूँढ लें।"
सभी ने देखा कि श्रीकृष्ण यज्ञ में आदि से अंत तक अतिथियों के चरण धोने , झूठी पत्तलें उठाने तथा सफाई रखने का काम स्वयं करते रहे।
प्रभु की तस्वीर प्रकृति के कण-कण
एक धार्मिक प्रवृति का व्यक्ति था,भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा व आस्था थी। उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी।
एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा," भगवान मुझसे बात करो और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना।"
दूसरी बार वह जोर से चिल्लाया,"भगवान मुझसे कुछ बोलो तो और आकाश में घटाएं उमङऩे-घुमडऩे लगी बादलो की गडगड़ाहट होने लगी लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना।"
उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर-नीचे सब तरफ देखा और बोला,"भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा पर उसने देखा ही नहीं।"
आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा। भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया।अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा,"भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहाँ हो, मेरे पास हो,मेरे साथ हो।"
उसी समय एक तितली उड़ते हुए आकर उसकी हथेली पर बैठ गयी लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया और उदास मन से आगे चला गया। भगवान इतने सारे रूपों में उसके सामने आया, इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी।
ईश्वर प्रकृति के कण-कण में है लेकिन हम उसे किसी और रूप में देखना चाहते है इसलिए उसे कहीं देख ही नहीं पाते। इसे भक्ति में दुराग्रह भी कहते है। भगवन अपने तरीके से आना चाहते हैं और हम अपने तरीके से देखना चाहते हैं। जिससे बात नहीं बन पाती। हमें भगवान को हर जगह हर पल महसूस करना चाहिए।
एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा," भगवान मुझसे बात करो और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना।"
दूसरी बार वह जोर से चिल्लाया,"भगवान मुझसे कुछ बोलो तो और आकाश में घटाएं उमङऩे-घुमडऩे लगी बादलो की गडगड़ाहट होने लगी लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना।"
उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर-नीचे सब तरफ देखा और बोला,"भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा पर उसने देखा ही नहीं।"
आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा। भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया।अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा,"भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहाँ हो, मेरे पास हो,मेरे साथ हो।"
उसी समय एक तितली उड़ते हुए आकर उसकी हथेली पर बैठ गयी लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया और उदास मन से आगे चला गया। भगवान इतने सारे रूपों में उसके सामने आया, इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी।
ईश्वर प्रकृति के कण-कण में है लेकिन हम उसे किसी और रूप में देखना चाहते है इसलिए उसे कहीं देख ही नहीं पाते। इसे भक्ति में दुराग्रह भी कहते है। भगवन अपने तरीके से आना चाहते हैं और हम अपने तरीके से देखना चाहते हैं। जिससे बात नहीं बन पाती। हमें भगवान को हर जगह हर पल महसूस करना चाहिए।
कहाँ हैं भगवान ?
राम नाई की दुकान पर बाल कटवाने गया। नाई से बाल कटाते समय अक्सर देश-दुनिया की बातें हुआ करती थी। आज भी जब वो बाल कटवाने गया तो सिनेमा, राजनीति और खेल जगत आदि के बारे में चर्चा होने लगी अचानक भगवान के अस्तित्व को लेकर बात होने लगी।
नाई ने कहा,"देखिये भैया! आपकी तरह मैं भगवान के अस्तित्व में यकीन नहीं रखता।"
राम बोला,"तुम ऐसा क्यों कहते हो?"
नाई ने कहा," ये समझना बहुत आसान है, बस गली में जाइए और आप समझ जायेंगे कि भगवान नहीं है। आप ही बताइए कि अगर भगवान होते तो क्या इतने लोग बीमार होते? इतने बच्चे अनाथ होते? अगर भगवान होते तो किसी को कोई दर्द कोई तकलीफ होती? मैं ऐसे भगवान के बारे में नहीं सोच सकता जो इन सब चीजों को होने दे। आप ही बताइए कहाँ है भगवान?"
राम के पास उसकी बात का कोई उत्तर नहीं था इसलिए चुप ही रहा। नाई से बाल बनवाए और कुछ सोचते हुए दुकान से बाहर निकला और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद उसे एक लम्बी दाढ़ी-मूंछ वाला अधेड़ व्यक्ति आता दिखाई पड़ा, उसे देखकर लगता था मानो वो कितने दिनों से नहाया ना हो।
राम तुरंत नाई कि दुकान में वापस घुस गया और बोला, जानते हो इस दुनिया में नाई नहीं होते।
नाई ने कहा,"भला कैसे नहीं होते? मैं साक्षात तुम्हारे सामने हूँ।"
राम बोला,"अगर ऐसा होता तो किसी की भी लम्बी दाढ़ी-मूंछ नहीं होती पर वो देखो सामने उस आदमी की कितनी लम्बी दाढ़ी-मूंछ है।"
नाई ने कहा,"अरे नहीं भाई साहब नाई होते हैं लेकिन बहुत से लोग हमारे पास आते ही नही।"
राम बोला," बिल्कुल सही कहा आपने भगवान भी होते हैं पर लोग उनके पास नहीं जाते और ना ही उन्हें खोजने का प्रयास करते हैं, इसीलिए दुनिया में इतना दु:ख-दर्द है
नाई ने कहा,"देखिये भैया! आपकी तरह मैं भगवान के अस्तित्व में यकीन नहीं रखता।"
राम बोला,"तुम ऐसा क्यों कहते हो?"
नाई ने कहा," ये समझना बहुत आसान है, बस गली में जाइए और आप समझ जायेंगे कि भगवान नहीं है। आप ही बताइए कि अगर भगवान होते तो क्या इतने लोग बीमार होते? इतने बच्चे अनाथ होते? अगर भगवान होते तो किसी को कोई दर्द कोई तकलीफ होती? मैं ऐसे भगवान के बारे में नहीं सोच सकता जो इन सब चीजों को होने दे। आप ही बताइए कहाँ है भगवान?"
राम के पास उसकी बात का कोई उत्तर नहीं था इसलिए चुप ही रहा। नाई से बाल बनवाए और कुछ सोचते हुए दुकान से बाहर निकला और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद उसे एक लम्बी दाढ़ी-मूंछ वाला अधेड़ व्यक्ति आता दिखाई पड़ा, उसे देखकर लगता था मानो वो कितने दिनों से नहाया ना हो।
राम तुरंत नाई कि दुकान में वापस घुस गया और बोला, जानते हो इस दुनिया में नाई नहीं होते।
नाई ने कहा,"भला कैसे नहीं होते? मैं साक्षात तुम्हारे सामने हूँ।"
राम बोला,"अगर ऐसा होता तो किसी की भी लम्बी दाढ़ी-मूंछ नहीं होती पर वो देखो सामने उस आदमी की कितनी लम्बी दाढ़ी-मूंछ है।"
नाई ने कहा,"अरे नहीं भाई साहब नाई होते हैं लेकिन बहुत से लोग हमारे पास आते ही नही।"
राम बोला," बिल्कुल सही कहा आपने भगवान भी होते हैं पर लोग उनके पास नहीं जाते और ना ही उन्हें खोजने का प्रयास करते हैं, इसीलिए दुनिया में इतना दु:ख-दर्द है
भगवान शिव के 19 अवतार
मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।
2- नंदी अवतार
भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। त्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।
3- वीरभद्र अवतार
यह अवतार तब हुआ था जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए।
4- भैरव अवतार
शिव महापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तब वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखुन से ब्रह्मा के पांचवे सिर को काट दिया।
ब्रह्मा का पांचवा सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तब काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।
5- अश्वत्थामा
महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हंै
6- शरभावतार
भगवान शंकर का छटा अवतार है शरभावतार। शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार- हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था।
हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव शरभ के रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पुंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की
7- गृहपति अवतार
भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। इसकी कथा इस प्रकार है- नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की।
एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्म ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।
8- ऋषि दुर्वासा
भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकी में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए जो देवताओं के द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर उससे प्रकट हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया
9- हनुमान
भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर अपना वीर्यपात कर दिया।
सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहित कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।
10- वृषभ अवतार
भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतार लिया था। इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु जी ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए जिन्होंने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।
11- यतिनाथ अवतार
भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया है। उन्होंने इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी जिसके कारण भील दम्पत्ति को अपने प्राण गवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा।
इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक का मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया
12- कृष्णदर्शन अवतार
भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। इस प्रकार यह अवतार पूर्णत: धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए नभग जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके, उनके धन को प्राप्त करे।
तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।
13- अवधूत अवतार
भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शनों के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उसका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा।
इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडऩा चाहा त्यों ही उसका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।
14- भिक्षुवर्य अवतार
भगवान शंकर देवों के देव हैं। संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी ही हैं। भगवान शंकर काभिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घडिय़ाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।
तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उसे बालक का पालन पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।
15- सुरेश्वर अवतार
भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नम: शिवाय का जाप करने लगा।
शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगा। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।
16- किरात अवतार
किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर( सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा।
अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर का बाण चलाया। शिव के माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरव पर विजय का आशीर्वाद दिया।
17- सुनटनर्तक अवतार
पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर जब शिवजी हिमाचल के घर पहुंचे तो नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।
जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।
18- ब्रह्मचारी अवतार
दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की।
जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें शमशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुईं
19- यक्ष अवतार
यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के धारण किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवता व असुर द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कण्ठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए साथ ही उनहें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं।
देवताओं के इसी अभिमान को तोडऩे के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्वों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी
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