जानिए, क्या है सत्संग का सही अर्थ?


भक्त को प्रथम धैर्य प्रभु प्राप्ति के लिए नहीं वरन् संत की कृपा प्राप्त करने के लिए करना होती है। यह कार्य प्रभु प्राप्ति से कम कठिन तथा महत्वपूर्ण नहीं है। यदि किसी संत की कृपा प्राप्त हो जाए तो समझो कि प्रभु प्राप्ति की आंतरिक यात्रा का प्रथम पड़ाव पूर्ण हो गया। संपर्क में तीन बातें हैं- समय दीजिएगा घर-परिवार में, सत्संग करिए। 

सत्संग का अर्थ प्रतिदिन किसी विद्वान से मिलना नहीं है, कोई पुस्तक पढ़ लीजिए। आदत बना लीजिए एक पुस्तक आपके बगल में रहे, आपके बैग में रहे, आपके घर में रहे। सोने के पहले एक-आधा पन्ना पढ़ लें, दो लाइन पढ़ लें बस। कोई बात नहीं पांच साल में पुस्तक पूरी करिएगा। आपका एक अनुशासन बनना चाहिए कि आप कोई विचार उठा रहे हैं। कृष्ण ने उद्धव से जाते हुए कहा था कि उद्धव मुझे अफसोस है कि मुझे जीवन में अच्छे लोग नहीं मिले। जाते-जाते कह गए यदि कोई भूले से अच्छा आदमी आपके पास आए तो बाहों में भर लेना, दिल में उतार लेना। बड़ा मुश्किल है दुनिया में अच्छे आदमी को ढूंढऩा, नहीं मिलेंगे। आपको ऐसा लगता है कि आपने माता-पिता की सेवा कर ली, सत्संग भी कर लिया लेकिन चिंतन करके आपने जो भी कुछ किया है, रात को सोने से पहले स्वयं से एक बार पूछ लीजिएगा कि आज सबकुछ ठीक रहा।

ईमानदारी से पूछोगे तो एक थप्पड़ आपका जमीर आपको मारेगा, रोज थप्पड़ खाकर सोओगे। जरा खुद का थप्पड़ खाकर सोने का आनंद तो देखिए। आपका सद्चरित्र आपको लोरी गाकर, थपथपाकर सुलाएगा। यदि आपके जमीर ने, आपकी अंतरआत्मा ने कहा- हां आज तूने यह किया जो परमात्मा चाहता था। बस यह जीवन प्रबंधन के सात सूत्र हैं। अपने माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्त करें। इस महाअनुष्ठान के समापन में प्रवेष कर रहे हैं। भागवत ने बार-बार यह मांग की है कि मैंने जो बताया है उसे स्मरण करते रहना।