गीता सिखाती है कर्म का सही अर्थ


जीवन का दूसरा साहित्य है गीता। गीता महाभारत का एक छोटा सा हिस्सा है। जिस दिन 18 दिन का युद्ध आरंभ होने वाला था उस दिन अर्जुन थक गया तो भगवान ने पुन: अर्जुन को अपने कर्तव्य की ओर प्रेरित करने के लिए गीता का संदेश दिया था। केवल काम करने के लिए ही काम नहीं करना है। हर किए जा रहे काम के पीछे कर्तव्य, ईमानदारी और शत्प्रतिशत परिणाम लेने की तीव्र इच्छा होना चाहिए। 


गीता यही सिखाती है। महाभारत युद्ध के ठीक पहले पाण्डवों के बड़ें भाई युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा था हम युद्ध हार जाएंगे, क्योंकि कौरवों के पक्ष में भीष्म, कर्ण और द्रौणाचार्य जैसे योद्धा हैं। हमारे पास क्या है? सेना भी कम है। तब अर्जुन ने समझाया था भैया युद्ध हम ही जीतेंगे, क्योंकि हमारे पास कृष्ण हैं यानी धर्म है। जहां धर्म, वहां जीत। 



थोड़ी देर बाद युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण जो अर्जुन के सारथी थे, अर्जुन का रथ लेकर दोनों सेनाओं के बीच में पहुंचते हैं। अर्जुन ने जब कौरवों के पक्ष में अपने बुजुर्गों को देखा, रिश्तेदारों पर नजर डाली तो श्रीकृष्ण से कहने लगा मैं इस युद्ध को नहीं लड़ूंगा, इसमें मेरे अपने ही लोग मारे जाएंगे। तब कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं और इसी समझाइश से गीता का जन्म होता है। 



कृष्ण ने कहा था मुद्दा यह नहीं है कि तुम युद्ध लड़ोगे या नहीं, हिंसा होगी या नहीं। सवाल यह है कि तुम्हारी इस निष्क्रियता से अधर्म और पाप को समर्थन मिल जाएगा। तुम्हारा कर्तव्य है गलत को रोकना और ध्यान रखो काम करते समय मैं कर रहा हूं यह भाव हटाओ, क्योंकि कर्म में यदि मैं आता है तो सफल होने पर अहंकार आ जाता है और असफल होने पर अवसाद (डिप्रेशन) आ जाता है। इसलिए शस्त्र उठाओ और युद्ध करो। तुम्हारा दायित्व है काम करना। सही काम करोगे तो परिणाम सही मिलेगा।