जानिए, कितने दिनों का होता है ब्रह्माजी का एक दिन?


श्री शुकदेव ने कहा - परीक्षित! (तीसरे स्कंध में) परमाणु से लेकर द्विपरार्ध पर्यन्त काल का स्वरूप और एक-एक युग कितने-कितने वर्षों का होता है, यह मैं तुम्हें बतला चुका हूं। अब तुम कल्प की स्थिति और उसके प्रलय का वर्णन भी सुनो। इस प्रकार अब हम 12 वें स्कंध के चौथे अध्याय में प्रवेश कर रहे हैं। परीक्षित देह छोडऩे वाले हैं। जाते-जाते शुकदेवजी उनको प्रलय के बारे में बता रहे हैं।एक हजार चतुर्युगी का ब्रह्मा का एक दिन होता है। ब्रह्मा के इस दिन को ही कल्प भी कहते हैं। 

एक कल्प में चौदह मनु होते हैं। कल्प के अन्त में उतने ही समय तक प्रलय भी रहता है। प्रलय को ही ब्रह्मा की रात भी कहते हैं। उस समय ये तीनों लोक लीन हो जाते हैं, उनका प्रलय हो जाता है। इसक नाम नैमित्तिक प्रलय है। इस प्रलय के अवसर पर सारे विश्व को अपने अंदर समेट कर लीन कर ब्रह्मा और तत्पश्चात शेषशायी भगवान नारायण भी शयन कर जाते हैं।इस प्रकार रात के बाद दिन और दिन के बाद रात होते-होते जब ब्रह्माजी की अपने मान से सौ वर्ष की और मनुष्यों की दृष्टि में दो पराद्र्ध की आयु समाप्त हो जाती है।

तब महत्तत्व, अहंकार और पंचजन्मात्रा ये सातों प्रकृतियाँ अपने कारण मूल प्रकृति में लीन हो जाती हैं। राजन्! इसी का नाम प्राकृतिक प्रलय है।उस समय ब्रह्माण्ड के भीतर का सारा संसार एक समुद्र हो जाता है, सबकुछ जलमग्न हो जाता है। इस प्रकार जब जल-प्रलय हो जाता है, तब जल पृथ्वी के विशेष गुण गन्ध को ग्रस लेता है, अपने में लीन कर लेता है। गन्ध गुण के जल में लीन हो जाने पर पृथ्वी का प्रलय हो जाता है, वह जल में घुल-मिलकर जलरूप बन जाती है।इस प्रकार प्रलय का वर्णन शुकदेवजी ने किया।

हमारे समझने की बात यह है कि प्रलय का अर्थ है ध्वंस और पुनर्निर्माण। जीवन में स्थितियों के साथ ऐसा ही होता है। जब हम असफल हो जाएं तो पुन: सफलता की तैयारियां करें। शुकदेवजी आगे समझा रहे हैं।जैसे व्यवहार में मनुष्य एक ही सोने को अनेकों रूपों में गढ़-गलाकर तैयार कर लेते हैं और वह कंगन, कुण्डल, कड़ा आदि अनेकों रूपों में मिलता है। इसी प्रकार व्यवहार में निपुण विद्वान् लौकिक और वैदिक वाणी के द्वारा इन्द्रियातीत आत्मस्वरूप भगवान का भी अनेकों रूपों में वर्णन करते हैं।

बादल सूर्य से उत्पन्न होता है और सूर्य से ही प्रकाशित। फिर भी वह सूर्य के ही अंश नेत्रों के लिए सूर्य का दर्शन होने में बाधक बन बैठता है। इसी प्रकार अहंकार भी ब्रह्म से ही उत्पन्न होता है, ब्रह्म से ही प्रकाशित होता और ब्रह्म के अंश जीव के लिए ब्रह्मस्वरूप के साक्षात्कार में बाधक बन बैठता है।

परीक्षित को शुकदेवजी ने चार प्रकार के प्रलय का वर्णन किया- नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय, प्राकृतिक प्रलय और आत्यन्तिक प्रलय। वास्तव में काल की सूक्ष्म गति ऐसी ही है। हे परीक्षित! भगवान नारायण ही समस्त प्राणियों और शक्तियों के आश्रय हैं।